दास्तान - वक्त के फ़ैसले

लेखक: राज अग्रवाल


अध्याय-१


ज़ूबी ने अपने चेहरे पर आते हुए अपने बालों को हटाया और कंप्यूटर में रिपोर्ट तैयार करने में जुट गयी। ज़ूबी को चार साल हो गये थे “रवि एंड देव” कंपनी के साथ काम करते हुए। “रवि एंड देव” देश की मानी हुई लॉ फ़र्म थी। ज़ूबी को ये नौकरी अपनी मेहनत और लगन से हासिल हुई थी। काम का बोझ इतना ज्यादा था कि कभी-कभी तो उसे १८ घंटे तक काम करना पड़ता था। वो पूरी मेहनत से काम कर रही थी और उसका लक्ष्य अपनी मेहनत से फ़र्म का पार्टनर बनने का था। उसकी गहरी नीली आँखें कंप्यूटर स्क्रीन पर गड़ी हुई थी कि उसकी सेक्रेटरी ने उसे आवाज़ दी, “ज़ूबी रवि सर अपने केबिन में तुमसे मिलना चाहेंगे।”

ज़ूबी ने मुड़कर सेक्रेटरी की तरफ़ देखा, “क्या तुम्हें पता है वो किस विषय में मिलना चाहते हैं

“नहीं मुझे सिर्फ़ इतना कहा कि मैं तुम्हें ढूँढ कर उनसे मिलने को कह दूँ” सेक्रेटरी ने जवाब दिया।

“शुक्रिया रजनी, मैं अभी उनसे मिल कर आती हूँ। मेरे जाने के बाद मेरे केबिन को बंद कर देना इतना कहकर वो कमरे में लगे शीशे के सामने अपना मेक-अप ठीक करने लगी। प्रोफेशन में होने के बावजूद ज़ूबी अपने पहनावे का और दिखावे का पूरा ख्याल रखती थी। उसने अपने पतले और सुंदर होठों को खोल कर उन पर हल्के गुलाबी रंग की लिपस्टिक लगायी। ज़ूबी ने फिर अपने सिल्क के टॉप को दुरुस्त किया जो उसकी भारी और गोल चूचियों को ढके हुए था। २८ साल की उम्र में भी उसका बदन एक कॉलेज में पढ़ती लड़की की तरह था। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

उसने अपनी हाई हील की सैंडल पहनी जो उसने अपने पैरों को आराम देने के लिए कुछ देर पहले खोल दी थी। वो रवि के केबिन की और जाते हुए सोच रही थी, “पता नहीं रवि सिर मुझसे क्यों मिलना चाहते हैं, इसके पहले ऐसा कभी नहीं हुआ है।”

ऑफिस के हाल से गुजरते हुए उसे पता था कि सभी मर्द उसे ही घुर रहे हैं। सबकी निगाहें उसके चूत्तड़ की गोलाइयों पे गड़ी रहती थी। वो हमेशा चाहती थी कि उसकी लंबाई पाँच फुट पाँच इंच से कुछ ज्यादा हो जाये। इसी लिए वो हाई हील की सैंडल पहना करती थी।

ज़ूबी केबिन के दरवाजे पर दस्तक देते हुए केबिन मे पहुँची। रवि ने उसे बैठने के लिये कहा।इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

“ज़ूबी! मिस्टर राज के केस में कुछ प्रॉब्लम क्रियेट हो गयी है” रवि ने कहा।

ज़ूबी रवि की बात सुनकर चौंक पड़ी। मिस्टर राज हज़ारों करोड़ रुपैयों की एक मीडिया कंपनी के मालिक थे। मिस्टर राज की कंपनी रवि की कंपनी के बड़े ग्राहकों में से थी बल्कि उनकी सिफारिश से भी कंपनी को काफी बिज़नेस मिलता था। ज़ूबी पिछले एक साल से मिस्टर राज की कंपनी के टीवी और रेडियो स्टेशन के लायसेंस को सरकार से रीन्यू (नवीकरण) के काम में लगी हुई थी।

“ज़ूबी मुझे अभी-अभी खबर मिली है कि सरकार शायद मिस्टर राज की रीन्यूअल ऐप्लीकेशन को रद्द कर दे... कारण उनकी ऐप्लीकेशन में बहुत सी बतों का खुलासा करना रह गया है” रवि ने घूरते हुए उसकी तरफ़ देखा।

ज़ूबी घबरा गयी। उसने पूरे साल भर मेहनत करके सब ऐप्लीकेशंस तैयार की थी। उसे याद नहीं आ रहा था कि उससे गलती कहाँ हुई है पर रवि के गुस्से से भरे चेहरे से पता चल रहा था कि गलती कहीं न कहीं तो हो चुकी है।

रवि ने उसे थोड़ा नम्र स्वर में कहा, “देखो ज़ूबी मुझे पता है कि तुमने काफी मेहनत से ये ऐप्लीकेशंस तैयार की थी। मैं हमेशा से तुम्हारी मेहनत और लगन का कायल रहा हूँ। पर कभी कभी गलतियाँ घर चल कर आ जाती हैं।”

ज़ूबी जानती थी कि ये बात कहाँ जाकर खत्म होगी, “सर अगर इस गलती का दंड किसी को मिलना है तो वो मुझे मिलना चाहिए, क्योंकि सही ऐप्लीकेशंस तैयार करने की जिम्मेदारी मेरी थी और मैं ही अपना काम अच्छी तरह नहीं कर पायी।”

ज़ूबी ने हिम्मत से ये कह तो दिया था, पर वो जानती थी कि इससे उसका भविष्य बर्बाद हो जायेगा। जो सपने उसने इस कंपनी के साथ रहते हुए देखे थे वो सब चूर हो जायेंगे और शायद उसे किसी दूसरी कंपनी में भी नौकरी नहीं मिलेगी।

तभी रवि ने उसपर दूसरी बिजली गिरायी।

“ज़ूबी जैसे तुम्हें पता है कि ऐप्लीकेशन पर तुम्हारे और मिस्टर राज के दस्तखत हैं, डिपार्टमेंट वाले सोच रहे हैं कि जानबूझ कर ऐप्लीकेशन में कुछ बातें छिपायी गयी हैं। और इस वजह से तुम दोनों को हिरासत में भी लिया जा सकता है और मुकदमा भी चल सकता है।”

ज़ूबी ये सुन कर दहल गयी। उसकी आँखों में दहशत के भाव आ गये। उसकी बदनामी, गिरफतारी, मुकदमा सब सोच कर वो डर गयी। कोई बात खुलासा करना रह गयी वो फ्रॉड कैसे हो सकता है। “सर आप तो जानते हैं कि मैंने ये सब जानबूझ कर नहीं किया, गलती ही से रह गया होगा।” वो रोने लगी, “सर आप ही बतायें कि मैं क्या करूँ

“मैं जानता हूँ कि तुम एक मेहनती और इमानदार औरत हो, पर पहले हमें मिस्टर राज की चिंता करनी चाहिए। अगर सरकार ने हमारी फ़र्म और मिस्टर राज को जिम्मेदार ठहरा दिया तो हम सब बर्बाद हो जायेंगे।” रवि ने अपनी बात जारी रखी, “एक काम करो... तुम अपने केबिन में जाकर शांति से बैठ जाओ, और इस बात का जिक्र किसी से भी नहीं करना। ये बहुत ही नाजुक मामला है... अगर एक शब्द भी लीक हो गया तो हम बर्बाद हो जायेंगे।”

ज़ूबी ने सहमती में अपनी गर्दन हिला दी।

“अपने केबिन में जाओ और मेरे फोन का इंतज़ार करो। मैं मिस्टर राज से कॉन्टेक्ट करता हूँ और उन्हें सारी बात समझाता हूँ... फिर सोचते हैं कि हमें क्या करना चाहिए” रवि ने कहा।

ज़ूबी वापस अपने केबिन मे पहुँची। उसका दिमग काम नहीं कर रहा था कि वो क्या करे। उसे पता नहीं था कि अगर वो गिरफ़्तार हो गयी तो उसका मंगेतर आगे उससे रिश्ता रखेगा कि नहीं। वो अपनी कुर्सी पर बैठ कर बाहर देखने लगी। उसे महसूस हुआ कि उसका शरीर डर के मारे काँप रहा था।

करीब एक घंटे के लंबे इंतज़ार के बाद रवि का फोन आया, “ज़ूबी राज एक कॉनफ्रेंस के सिलसिले में होटल अंबेसडर के सुइट नंबर १५०४ में है। उसने तुम्हें तुरंत ऐप्लीकेशन की कॉपी लेकर बुलाया है। तुम तुरंत चली जाओ... मैं थोड़ी देर में आता हूँ।”

“ठीक है सर! मैं अभी चली जाती हूँ।”

फोन पर थोड़ी देर खामोशी छायी रही।

“ज़ूबी तुम्हें पता है ना कि ये मीटिंग हमारी फ़र्म के लिये कितनी महत्वपूर्ण है।” थोड़ी और खामोशी के बाद, “और तुम्हारे लिए भी।”

ज़ूबी ने रवि को बताया कि उसे पता है। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

काँपती हुई ज़ूबी ने फाइल उठाई और होटल अंबेसडर की ओर चल दी।

करीब डेढ़ घंटे की बहस के बाद भी ज़ूबी मिस्टर राज को ये नहीं समझा पायी कि उससे गलती कैसे और कहाँ हुई। ये बात राज को झल्लाय जा रही थी और आखिर वो गुस्से में बरस पड़ा। “क्या तुम मुझे ये बताने की कोशिश कर रही हो कि तुम्हें ये नहीं पता कि क्या और कौनसी बातें ऐप्लीकेशन मे छूट गयी हैं। मैं ही बेवकूफ़ था जो इतने महत्वपूर्ण काम पर “रवि एंड देव” पर भरोसा किया। क्या तुम कोई जवाब दे सकती हो राज गुस्से में जोर से बोला।

ज़ूबी की आँखों में आँसू आ गये। आज तक राज ने उसे बहुत इज्जत और अच्छे व्यवहार से ट्रीट किया था। ४५ साल का राज एक कसरती बदन का मर्द था। वो गुस्से में अपने हाथ का मुक्का बना कर दूसरी हथेली पे मार रहा था जैसे कि एक ही वार में ज़ूबी को मार गिरायेगा।

राज ज़ूबी की ओर देख कर अपने आप से कह रहा था, “क्या बदन है इसका। भारी-भारी चूचियाँ और इतनी पतली कमर। पता नहीं बिस्तर में कैसी होगी।” जब ज़ूबी कागज़ों से भरी टेबल पर झुकी तो राज को उसकी लंबी टाँगें और बड़े-बड़े कुल्हों की झलक मिली। “थोड़ी देर में ही इसकी गाँड ऐसे मारूँगा कि ये याद रखेगी।”

“ज़ूबी! मैंने अपने क्रिमिनल लॉयर से बात कर ली है, उसका कहना है कि अगर मैंने तुम पे और तुम्हारी फ़र्म पे भरोसा करके साइन किये हैं तो मुझ पर कोई इल्ज़ाम नहीं आता है। अब तुम फँस चुकी हो... मैं नहीं। मुझे टेंशन है कि मेरा करोड़ों का नुकसान हो जायेगा।” राज ने उसे घूरते हुए कहा।

“मैं समझ सकती हूँ सर” ज़ूबी अपनी गर्दन झुकाते हुए बोली। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

“क्या समझती हो तुम, कि तुम्हारी जैसी नासमझ वकिल की वजह से मैं अपना करोड़ों का नुकसान होने दूँगा। याद रखना तुम कि अगर मेरा एक पैसे का भी नुकसान हुआ तो मैं तुम्हारी पूरी लॉ फ़र्म बंद करवा दूँगा।”

“सर मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ।” ज़ूबी गिड़गिड़ाते हुए बोली, “सर कुछ भी जो आप कहें।”

राज थोड़ी देर तक कुछ सोचता रहा, “ठीक है मैं अपने क्रिमिनल लॉयर से बात करता हूँ कि वो तुम्हें कैसे बचा सकता है। जब तक मैं बात करता हूँ, तुम एक काम करो... अपने कपड़े उतार कर नंगी हो जाओ और मेरे लंड को चूसो... सिर्फ़ इसी तरह तुम मेरी मदद कर सकती हो।”

ज़ूबी पत्थर की बुत बन कर खड़ी थी। राज फोन पर अपने वकिल से बात कर रहा था, “हाँ वो तो फँसेगी ही पर उसकी फ़र्म को भी काफी नुकसान होगा, क्या कोई तरीका नहीं है कि इन सबसे छुटकारा मिल सके

“थोड़ा उसकी उम्र और उसके भविष्य का ध्यान दो, बेचारी मर जायेगी। उसकी फ़र्म के बारे में सोचता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए। हाँ वो इस समय मेरे पास ही खड़ी है।”

“क्या तुम ये कहना चाहते हो कि अब उसका और उसकी फ़र्म का भविष्य मेरे हाथ में है...? तो ठीक है मैं सोचुँगा कि इस लड़की को इस समस्या से बचाना चाहिए कि नहीं।”

राज ज़ूबी को घुरे जा रहा था, जैसे वो उसके आगे बढ़ने का इंतज़ार कर रहा हो। राज होटल की कुर्सी पे अपनी दोनों टाँगों को फैलाये बैठा था।

अपने आपको भविष्य के सहारे छोड़ते हुए ज़ूबी ने अपनी ज़िंदगी की राह में अपना पहला कदम बढ़ा दिया। उसने गहरी साँस लेते हुए अपने हाथ अपने टॉप के ऊपर के बटन पर रखे और बटन खोलने लगी। थोड़ी ही देर में उसका टॉप खुल गया और उसने उसे अपने कंधों से निकाल कर उसे उतार दिया। फिर उसने अपनी स्कर्ट के हुक खोल कर उसे नीचे गिरा दिया। अपनी हाई हील्स की सैंडल निकाले बगैर उसने स्कर्ट को उतारा और सैंडलों के अलावा सिर्फ़ ब्रा और पैंटी में राज के सामने खड़ी थी।

ज़ूबी राज को देख रही थी कि उसकी ओर से कोई प्रतिक्रिया हो पर वो वैसे ही अपनी कुर्सी पर बैठा रहा।

ज़ूबी सोच रही थी कि आगे वो क्या करे कि इतने में राज ने फोन के माउथ पीस पर हाथ रख कर कहा, “अब तुम किसका इंतज़ार कर रही हो। जल्दी से अपनी पैंटी और ब्रा उतार के मेरे पास आओ।”

ज़ूबी ने अपनी ब्रा के हुक खोल कर अपनी ब्रा उतार दी। उसकी गोल -गोल चूचियाँ बाहर निकल पड़ी। फिर उसने अपनी पैंटी नीचे कर के उतार दी। उसने देखा कि राज उसकी चूत को घूर रहा था। उसने अपने मंगेतर के कहने पर कल ही अपनी चूत के बल साफ किये थे। उसे शरम आ रही थी कि आज कोई मर्द उसकी चूत को इस तरह घूर रहा है।

राज अभी भी फोन पर बात कर रहा था। वो अपनी कुर्सी से उठा और ज़ूबी को देख कर अपनी पैंट की ज़िप की ओर इशारा किया। ज़ूबी उसके पास आ घुटनों कल बैठ गयी। फिर उसने उसकी पैंट के बटन खोले और उसके सुस्त पड़े लंड को अपने हाथों में ले लिया। फिर अपने होठों को खोल कर अपनी जीभ से उसके लंड के सुपाड़े को चाटने लगी।

ज़ूबी ने आज से पहले अपने मंगेतर के सिवाय किसी और के लंड को नहीं चूसा था। अपने मंगेतर का भी सिर्फ़ एक बार जब वो काफी नशे में हो गया था और उसे चूसने की जिद की थी। पर आज उसके पास कोई चारा नहीं था। उसने अपना पूरा मुँह खोल कर राज के लंड को मुँह में ले लिया और चूसने लगी। उसकी जीभ का स्पर्श पाते ही लौड़े में जान आ गयी और वो ज़ूबी के मुँह में पूरा तन गया। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

राज ने अपनी पैंट नीचे खिसका दी। ज़ूबी एक हाथ से उसके लंड को पकड़े हुए थी और अपने मुँह को ऊपर नीचे कर रही थी जैसे कोई लॉलीपॉप चूस रही हो। राज हाथ बढ़ा कर उसकी चूचियों के निप्पल को अपने अंगूठे और अँगुली में ले कर भींचने लगा। उसके छूते ही निप्पल में जान आ गयी और वो खड़े हो गये।

राज ने फोन पर बात करना जारी रखा। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

“ज़ूबी खान नाम है उसका। हाँ यार तुम जानते हो उसे... वही जिसने लॉ परीक्षा मे स्टेट में टॉप किया था। हाँ वही...। अरे वो यहीं है इस वक्त... मेरे लंड को चूस रही है... तुम्हें क्या लगता है... मैं मजाक कर रहा हूँ...? थोड़ी देर में मैं उसकी चूत चोदने वाला हूँ।”

राज की बातें सुनकर ज़ूबी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। फिर भी वो जोरों से उसके लंड को चूस रही थी। वो जानती थी कि उसके पास बस एक यही उपाय है अपने आप को इस मुसीबत से बचाने का। उसने लंड चूसना जारी रखा।

राज ने फोन नीचे रखा और अपने दोनों हाथ ज़ूबी के सिर पर रख कर अपने लंड को और अंदर उसके गले तक डाल दिया। उसकी बढ़ती हुई साँसों के देख कर ज़ूबी समझ गयी कि उसका लंड अब पानी छोड़ने वाला है।

“हाँआँआँआँ चूऊऊसो ओहहहहह और जोर से चूसो” राज अपने लंड को और अंदर तक घुसेड़ कर बड़बड़ा रहा था।

ज़ूबी एक हाथ से उसके लंड की गोलियों को सहला रही थी और दूसरे हाथ से उसके लंड को पकड़े चूस रही थी। थोड़ी देर में राज का लंड अकड़ना शुरू हो गया। राज ने अपने दोनों हाथों का दबाव ज़ूबी के सिर पर रख कर अपने लौड़े को और अंदर गले तक डाल दिया और अपने वीर्य की पिचकारी छोड़ दी।

ज़ूबी ना चाहते हुए भी उसके लंड से निकला पूरा पानी गटक गयी। राज अपने लंड को उसके मुँह मे तब तक अंदर बाहर करता रहा जब तक कि उसका लंड थोड़ा ढीला नहीं पड़ गया। ज़ूबी उसके लंड को अपने मुँह से निकालने को डर रही थी कि कहीं वो नाराज़ ना हो जाये पर राज ने अपना लंड उसके मुँह से निकाल लिया। उसके लंड के निकलते ही उसके पानी की धार ज़ूबी के चेहरे से होती हुई उसकी छाती और टाँगों पर चू पड़ी।

तभी फोन की घंटी बजी और राज फोन उठा बात करने लगा। बात करते हुए उसने ज़ूबी को उसके कंधों से पकड़ कर खड़ा कर दिया। राज ने उसे घुमा कर इस तरह खड़ा कर दिया कि ज़ूबी की पीठ उसकी तरफ़ थी।

फोन पर बात करते हुए राज पीछे से अपने हाथ उसकी छाती पर रख कर उसके मम्मे मसल रहा था। ज़ूबी ने महसूस किया की उसका लंड उसकी गाँड की दरार पर रगड़ खा रहा है। राज उसके कान में धीरे से बोला, “जाओ जाकर बिस्तर पर लेट जाओ, अब मैं तुम्हें चोदूँगा।”

जैसे ही ज़ूबी बिस्तर की ओर बढ़ी, राज उसके बदन को घुरे जा रहा था। क्या पतली कमर है और क्या गोल गोल चूत्तड़। उसने ऐसे बदन जिम में कई देखे थे। उसके भरे चूत्तड़ों को देख कर राज के मुँह में पानी आ रहा था, “आज मैं इसकी गाँड मार के रहुँगा” वो सोच रहा था।

ज़ूबी जैसे ही बिस्तर पर लगे कवर को हटाकर उसमें घुसने लगी तो राज बोला, “ज़ूबी तुम बेड के ऊपर नंगी ही लेटी रहो... मैं तुम्हारे नंगे बदन को देखना चाहता हूँ और अपने सैंडल मत उतारना।”

राज उसे घुरे जा रहा था। वो जानता था की ज़ूबी आज हर वो काम करेगी जो वो कहेगा। उसकी उभरी और भरी हुई चूचियाँ फिर एक बार उसके लंड में जान फूँक रही थी।

पिछले आधे घंटे से राज ज़ूबी के ऊपर लेटा हुआ अपने भारी लंड को उसकी चूत में अंदर बाहर कर रहा था। ज़ूबी की दोनों टाँगें राज की कमर से लिपटी हुई थी। राज अपने हाथों से उसके दोनों चूत्तड़ों को पकड़े हुए था और अपने लंड को आधा बाहर निकालते हुए पूरी ताकत से उसकी चूत में पेल रहा था।

ज़ूबी के दोनों हाथ राज की पीठ पर थे और राज जब पूरी ताकत से धक्का लगाता तो ज़ूबी को अपना शरीर पिसता हुआ महसूस होता। वो दिवार पर लगे शीशे में देख रही थी की राज का भारी शरीर कैसे उसके नाज़ुक बदन को रौंद रहा था। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

मन में डर और इस बे-इज्जती के बावजूद अब उसके शरीर और टाँगों ने विरोध करना छोड़ दिया था। चुदाई इतनी देर चल रही थी की अब उसे भी आनंद आ रहा था। वो भी अपने कुल्हे उछाल कर उसका साथ दे रही थी। उसे ऐसा लग रहा था की राज का लंड नहीं बल्कि उसके मंगेतर का लंड उसे चोद रहा है। जब भी राज का लंड उसकी चूत की जड़ पर ठोकर मारता तो उसके मुँह से सिस्करी निकल रही थी, “ओहहहहहहह आहहहहहहह”

आखिर में राज का शरीर अकड़ने लगा और उसने ज़ूबी को जोर से बाँहों में भींचते हुए अपना लंड पूरा अंदर डाल कर अपना पानी छोड़ दिया। ज़ूबी ने भी सिस्करियाँ भरते हुए उसके साथ ही पानी छोड़ दिया।

राज थोड़ी देर उसके बदन पर लेटा अपनी साँसों को काबू में करता रहा और फिर पलट कर बिस्तर पर लेट गया। जैसे ही राज उसके शरीर से हटा, ज़ूबी बिस्तर से लड़खड़ाते हुए उठी और अपने कपड़े ले कर बाथरूम में घुस गयी।

ज़ूबी अपने कपड़े पहन कर बाथरूम से बाहर आयी तो देखा की राज अभी भी बिस्तर पर नंगा लेटा है और वो टीवी का रिमोट पकड़े चैनल बदल रहा है।

“देखो इसे राज ने कहा।

ज़ूबी की नज़रें जैसे ही टीवी स्क्रीन पर पड़ी तो उसने देखा की वो उसकी और राज की चुदाई की फ़िल्म थी। राज ने उसके साथ चुदाई का पूरा वीडियो टेप बना लिया था।

“ज़ूबी” उसने कहा, “आज से मैं “रवि एंड देव” कंपनी को अपने इशारों पर नचा सकता हूँ और साथ ही आज से तुम्हें हर वो काम करना है जो मैं चाहुँगा।”

ज़ूबी ये टेप देख कर घबरा गयी थी और अपनी किस्मत को कोस रही थी कि वो कहाँ तो एक सफ़ल वकील बनने आयी थी और अब हालात उसे एक वेश्या बना रहे थे।

“तुम अपना फोन नंबर, घर का पता और मोबाइल नंबर लिख कर दे दो और जब मैं तुम्हें बुलाऊँ, तुम्हें आना पड़ेगा” राज ने उसे घूरते हुए कहा।

ज़ूबी समझ गयी थी कि उसके पास कोई चारा नहीं था, इसलिए उसने जल्दी से सब लिखा और लगभग भागते हुए कमरे से बाहर चली गयी।

राज के होठों पर एक सफ़ल मुस्कान थी। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

दूसरे दिन ज़ूबी अपने ऑफिस पहुँच कर मिस्टर रवि से मिली, “सर हालातों को देखते हुए मिस्टर राज के साथ कल की मीटिंग अच्छी गयी। मुझे लगता है की समस्या का कोई ना कोई हल निकल ही आयेगा।”

जो कुछ भी उसके और राज के बीच हुआ था वो उसने नहीं बताया और ना ही टेप के बारे में। ये भी नहीं बताया की राज का फोन सुबह आया था और उसने कहा था की आज से जब भी वो उससे मिले तो ब्रा और पैंटी ना पहने।

“मेरी मिस्टर राज के साथ थोड़ी देर में मीटिंग होने वाली है। ज़ूबी तुम यहीं ऑफिस में रहना... हो सकता है मिस्टर राज को तुम्हारी ज़रूरत पड़े” रवि ने उससे कहा।

ज़ूबी डरी और सहमी हुई अपने केबिन मे पहुँची। उसे राज के रुतबे के बारे में मालूम था और वो जानती थी की अगर उसने उसकी बात नहीं मानी तो वो कुछ भी कर सकता था।

अपने केबिन में दाखिल होने से पहले वो साथ में लगे बाथरूम मे गयी और अपनी ब्रा और पैंटी उतार दी। उसने दीवार पर लगे शीशे मे अपने आप को देखा तो शर्मा गयी। उसके सिल्क के टॉप में से उसके मम्मे साफ़ झलक रहे थे। उसके निप्पल साफ़ टॉप में से बाहर को निकालते दिखायी पड़ रहे थे।

ज़ूबी जल्दी से अपनी ब्रा और पैंटी अपने हाथों में लिए दौड़ती हुई अपने केबिन में वापस आ गयी। केबिन में आने के बाद उसने अपना बिज़नेस कोट पहन लिया जिससे उसके टॉप में से छलकती चूचियों को ढांपा जा सके।

ज़ूबी अपनी कुर्सी पर बैठ कर काम करने की कोशिश कर रही थी पर उसका सारा ध्यान मिस्टर राज और मिस्टर रवि के बीच चल रही मीटिंग पर था। थोड़ी देर बाद मिस्टर रवि का फोन आया, “ज़ूबी मिस्टर राज तुमसे अभी तुम्हारे केबिन में मिलना चाहेंगे।”

“ठीक है सर... उन्हें भेज दीजिए, मैं इंतज़ार कर रही हूँ” ज़ूबी ने जवाब दिया।

ज़ूबी अपनी कुर्सी पे चिंतित बैठी थी। हज़ारों ख्याल उसके दिमाग में घूम रहे थे। फिर भी वो पूरी कोशिश कर रही थी कि वो चेहरे से चिंतित ना दिखे। थोड़ी देर में उसके केबिन के दरवाजे पर दस्तक हुई और उसकी सेक्रेटरी मिस्टर राज के साथ अंदर आयी। राज के पीछे एक और व्यक्ति केबिन में दाखिल हुआ जिसे देख कर एक बार के लिये ज़ूबी को थोड़ी राहत मिली।

राज ने उस व्यक्ति को दरवाज़ा बंद करने के लिये कहा और ज़ूबी से उसका परिचय कराया। “ज़ूबी ये मिस्टर अमित मेरे दोस्त हैं जो लायसेंस रीन्यूअल डिपार्टमेंट में काम करते हैं। इन्होंने ही हमारी ऐप्लीकेशन की गल्तियों को पकड़ा है।” ज़ूबी ने एक मुस्कान के साथ उससे हाथ मिलाया।

मिस्टर अमित दिखने में ही एक सरकरी मुलाज़िम लग रहा था। पुराने स्टाइल के कपड़े, बालों में मन भर तेल और नाक पर मोटे काँच का चश्मा। पर अपनी पोज़िशन की वजह से थोड़ा कठोर स्वभाव का लग रहा था। ज़ूबी ने देखा की उसकी पैंट जो उसके पेट के नीचे लटक रही थी, शायद तब खरीदी गयी थी जब उसका साइज़ ३४ था जो कि आज लगभग ४० था।

राज ने धीरे से ज़ूबी से कहा, “ज़ूबी हम जिस विषय पर बात करने वाले हैं उसमें थोड़ा समय लग सकता है।”

ज़ूबी ने अपनी सेक्रेटरी को फोन लगाया, “मेरे आने वाले हर फोन को रोक देना, मैं मिस्टर राज और मिस्टर अमित के साथ एक जरूरी मीटिंग में हूँ।”

“ज़ूबी मिस्टर अमित चाहते हैं की हम तीनों मिलकर इस समस्या का हल निकाल लें। पर किसी को मालूम नहीं होना चाहिए की हमने साथ में मुलाकात की है। और मैंने इन्हें ये भी बता दिया है की सारी ऐप्लीकेशन तुमने ही तैयार की हैं।” राज ने मीटिंग शुरू करते हुए कहा।

करीब एक घंटे की बहस के बाद ज़ूबी को पता चला कि अगर लायसेंस रीन्यू नहीं हुए तो राज की कंपनी को कितना घाटा हो सकता है। मिस्टर अमित अगर नयी ऐप्लीकेशन से पुरानी वाली बदल भी देते हैं तो इन्हें अपने और साथी को मिलाना होगा। जैसे-जैसे समय गुज़र रहा था, राज के चेहरे पर झल्लाहट के भाव आते जा रहे थे।

“अमित ज़ूबी को हमारी परिस्थिति के बारे में अच्छी तरह मालूम है। उसे ये भी मालूम है की गलती उससे हुई है। वो अच्छी तरह जानती है की मैं इसकी कंपनी को बर्बाद कर सकता हूँ पर इन सबसे मेरा जो घाटा होगा वो तो पूरा नहीं होगा ना” राज का गुस्सा साफ़ दिखायी दे रहा था।

“ज़ूबी इस कंपनी के बोर्ड पर है और हमारी हर तरह से सहायता करने को तैयार है... है न ज़ूबी।” ज़ूबी ने हाँ में अपनी गर्दन हिला दी।

राज ने अपना अगला कदम बढ़ाया। वो खड़ा होकर ज़ूबी के डेस्क के पास चहल कदमी करने लगा, “अमित हमें इस काम को अंजाम देना है। तुम्हें अच्छी तरह पता है की कैसे अंजाम दिया जाता है।”

फिर उसने ज़ूबी की तरफ़ देखा, “ज़ूबी जरा खड़ी हो जाओ।”

ज़ूबी काँपती टाँगों पर उसकी बात मानते हुए खड़ी हो गयी। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

राज चलते हुए ज़ूबी के पीछे आ गया और अमित उसे घुरे जा रहा था। उस करोड़पति ने ज़ूबी का कोट उतार दिया और उसके टॉप में से झलकती चूचियाँ साफ़ दिखायी देने लगी।

“अमित मैंने इस गुड़िया से कहा था की आज वो ब्रा नहीं पहने।” ज़ूबी के निप्पल अचानक ही तन गये थे। राज ने पीछे से उसके टॉप की ज़िप खोल दी और ज़ूबी पत्थर की मुरत बनी सहमी सी खड़ी थी। ज़ूबी की निगाहें अमित के चेहरे पर टिकी थी जो हैरत से उसकी और घूर रहा था।

राज ने ज़ूबी के टॉप को उसकी दोनों बाँहों से अलग करते हुए उतार दिया। अब वो कमर से उपर तक पूरी तरह नंगी खड़ी थी। पता नहीं डर के मारे या ठंड के मारे उसके निप्पल पूरी तरह से खड़े थे।

राज ने पीछे से उसकी चूचियों को मसलते हुए कहा, “अमित तुम्हें नहीं लगता की हम इस मामले को सुलझा लेंगे।”

“हाँ... हाँ! हम सुलझा लेंगे मिस्टर राज... आप चिंता ना करें।” अमित एक भूखे शिकारी की तरह ज़ूबी के बदन को घूरते हुए कहा।

“ज़ूबी तुम्हें नहीं लगता की हम इस दलदल से बाहर आ जायेंगे।” राज ने उसके स्कर्ट के हुक को खोलते हुए कहा।

“हाँ मिस्टर राज हम जरूर बाहर आ जायेंगे।” ज़ूबी ने उसकी हरकतों का बिना कोई विरोध करते हुए कहा।

ज़ूबी ने अमित की ओर देखा जो कामुक निगाहों से उसके बदन को घुरे जा रहा था। थोड़ी देर में उसने उसका हाथ अपने चूत्तड़ पर रेंगते हुए महसूस किया। उसके एक चूत्तड़ पर राज हाथ फिरा रहा था और दूसरे पर अमित का।

इतने में राज ने अपनी एक अँगुली ज़ूबी की चूत मे घुसा दी और अंदर बाहर करने लगा। ज़ूबी की निगाहें अपने केबिन के दरवाजे पर लगी हुई थी और वो अल्लाह से दुआ कर रही थी कि उसके केबिन में कोई ना आये। वो सिर्फ हाई हील के सैंडल पहने मेज़ का सहारा ले कर घोड़ी बन गयी थी।

ज़ूबी ने अपने पीछे कपड़ों की सरसराहट सुनी। राज ने थोड़ी देर के लिए अपने हाथ उसके चूत्तड़ से हटा कर अपनी बेल्ट को खोला और अपनी पैंट के बटन खोल कर उसे नीचे सरका दिया। उसने अपने खड़े लंड को ज़ूबी की चूत के छेद पर टिका दिया।

“नहीं प्लीज़ नहीं” वो धीरे से बोली।

“अमित हम ये मामला सुलझा कर रहेंगे। मैं जानता हूँ कि जो लोग मेरे लिए कम करते हैं वो हर हाल में मेरा कहा मानेंगे।” कहकर राज ने अपने हाथों से उसके चूत्तड़ को थोड़ा फ़ैलाया और अपने लंड को उसकी चूत में घुसा दिया। ज़ूबी के मुँह से एक चींख निकल पड़ी।

राज ने अपना लंड थोड़ा बाहर निकाला और जोर के धक्के के साथ पूरा लंड उसकी चूत मे डाल दिया। चींख की जगह एक सिस्करी निकल पड़ी ज़ूबी के मुँह से।

“साली कुत्तिया! अपनी टाँगें फ़ैला” राज गुस्से में बोला, “जब तक तू अपनी टाँगें नहीं फ़ैलायेगी, मैं अपना लंड तेरी चूत की जड़ तक कैसे पेलूँगा।”

राज का आधा लंड उसकी चूत मे घुसा हुआ था। बड़ी मुश्किल से ज़ूबी ने अपनी टाँगें फ़ैलायीं। जैसे ही उसकी टाँगें फ़ैलीं, राज ने उसे कंधों से पकड़ा और जोर के धक्के लगाने लगा। उसके हर धक्के के साथ ज़ूबी की चूचियाँ उछल रही थीं।

राज ने उसकी एक चूंची मसलते हुए जोर का धक्का मार कर अपना पानी उसकी चूत मे छोड़ दिया। जब उसके लंड से एक-एक बूँद निकल चुकी थी तो वो अपने लंड को बाहर निकाल कर उसके चूत्तड़ पर रगड़ने लगा।

ज़ूबी ने थोड़ी राहत की साँस ली। राज वक्त से पहले ही झड़ गया था। वो सीधी हो कर अपने कपड़े पहनने का विचार बना ही रही थी की, “तुम ये क्या कर रही हो राज ने पूछा।

“कपड़े पहन रही हूँ और क्या!” ज़ूबी ने जवाब दिया। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

“ये अमित के साथ नाइंसाफ़ी होगी ज़ूबी डियर!” राज ने जैसे ही ये कहा ज़ूबी ने अमित की तरफ़ देखा और वो दंग रह गयी। अमित अपने कपड़े उतार कर अपने लंड को सहला रहा था और ज़ूबी के नंगे बदन को देखे जा रहा था।

“तुम जहाँ हो वहीं रुको राज ने जैसे उसे आदेश दिया।इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

ज़ूबी के पास और कोई चारा नहीं था उसकी बात मानने के सिवा। वो उसी अवस्था में सिर्फ सैंडल पहने नंगी खड़ी रही, टेबल का सहारा लिए अपनी गाँड हवा में उठाये हुए। राज के लंड से चूता पानी अभी भी ज़ूबी की जाँघों पर बह रहा था। उसने टेबल से एक टिशू पेपर लिया और पानी को पौंछने लगी।

अमित बिना कोई समय गंवाय उसके पीछे आया और उसके चूत्तड़ चूमने लगा। “मेरी जान... अपनी टाँगों को थोड़ा फ़ैलाओ जिससे मैं अपना लंड तुम्हारी चूत में डाल सकूँ।” उसने अपना लंड ज़ूबी की चूत के मुहाने पर रखा और एक ही धक्के में अपना लंड उसकी चूत में पेल दिया।

ज़ूबी ने महसूस किया कि उसका लंड राज के लंड जितना मोटा और लंबा नहीं था। ज़ूबी जानती थी उसका लंड उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता और ये भी जानती थी कि अगर उसे इस जिल्लत से छुटकारा पाना है तो वो उस मर्द के पानी को छुड़ा दे।

यही सोच कर ज़ूबी ने अपनी टाँगों को थोड़ा सिकोड़ और अपनी चूत में उसके लंड को जकड़ लिया। अब वो उसके हर धक्के का साथ अपने कुल्हों को पीछे की ओर धकेल कर साथ दे रही थी।

अमित ने अपने हाथ बढ़ा कर उसके ममे पकड़ लिए और उन्हें मसलते हुए कस के धक्के मारने लगा।

ज़ूबी को अपने आप पर विश्वास नहीं हो रहा था। वो हमेशा से ही एक साधारण और संस्कृति को मानने वाली लड़की रही थी। और आज वो दिन के समय अपने ही ऑफिस में दो लौड़ों से अपने आप को चुदवा रही थी। ऐसा नहीं था कि इतनी भयंकर चुदाई उसे मज़ा नहीं दे रही थी पर इस समय उसका ध्यान अमित का पानी छुड़ाने पर ज्यादा था।

अमित जोर की हुंकार भरते हुए ज़ूबी को चोदे जा रहा था। दो तीन कस के धक्के मारने के बाद उसके लंड ने ज़ूबी की चूत में पानी छोड़ दिया। जैसे ही उसने अपना मुर्झाया लंड बाहर निकाला तो उसके वीर्य की बूँदें ऑफिस के कारपेट पर इधर उधर गिर पड़ी।

ज़ूबी बड़ी मुश्किल से अपनी उखड़ी साँसों पर काबू पा रही थी। उत्तेजना में उसका चेहरा लाल हो चुका था। बड़ी मुश्किल से उसने अपने आप को संभाला और अपने कपड़े पहने। उसने अपने कपड़े पहने ही थे की दरवाजे पर दस्तक हुई, “क्या मैं अंदर आ सकती हूँ ज़ूबी की सेक्रेटरी ने पूछा।

बड़ी मुश्किल से ज़ूबी ने कहा, “हाँ आ जाओ।”

ज़ूबी की सेक्रेटरी केबिन में आयी और ज़ूबी से पूछा कि क्या वो खाने का ऑर्डर देना चाहेगी। ज़ूबी ने उसे मना कर दिया की मीटिंग खत्म हो चुकी है और खाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। मगर वो जानती थी कि हवा में फ़ैली चुदाई की खुश्बू और उसके बिखरे हुए बाल उसकी सेक्रेटरी को सब कहानी कह देंगे।

ज़ूबी ने अपने आपको इतना अपमानित और गिरा हुआ कभी महसूस नहीं किया था। किस तरह उसकी तकदीर उसके साथ खेल रही थी। एक इंसान उसके जज़बात और शरीर के साथ खेल रहा था और वो मजबूरी वश उसका साथ दे रही थी। अब उसका एक ही मक्सद था की किसी तरह राज की हर बात मानते हुए वो उससे वो टेप हासिल कर ले जो उसने होटल के रूम में रिकॉर्ड कर ली थी।


अध्याय-२


ज़ूबी अपने आप पर बहुत शर्मिंदा थी। मजबूरी में उसे अपने मंगेतर से झूठ बोलना पड़ रहा था कि मिस्टर राज की ऑफिस में देर रात तक मीटिंग चलती है जिस वजह से वो उससे मिल नहीं पा सकती थी। आज उसने फिर झूठ बोला था कि एक अर्जेंट मीटिंग की वजह से वो उससे मिल नहीं पायेगी। कभी उसके दिल में विचार आता कि वो इस्तफा दे दे पर मामले की नज़ाकत को समझते हुए वो चुप रह जाती।

आज राज ने उसे रात को अपने होटल के सुइट में बुलाया था। उसकी बात मानने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं था। जैसे ही उसने होटल में कदम रखा, सबकी निगाहें उस पर जम गयी। सब जानते थे कि जब एक अमीर आदमी किसी लड़की को रात के वक्त बुलाता है तो उसका एक ही मक्सद होता है।

ज़ूबी राज से होटल के रेस्टोरेंट में मिली। राज किसी से फोन पर बात करते हुए अपने पैड पर कुछ लिख रहा था। ज़ूबी ने वही ड्रेस और सैंडल पहनी थी जो राज ने उसे पहनने के लिए कहा था। वो बिना ब्रा और पैंटी पहने उसकी टेबल के पास खड़ी थी।

जब राज की नज़रें ज़ूबी पर पड़ी, “अरे तुम खड़ी क्यों हो, बैठो ना।”

ज़ूबी राज के कहने पर सीट पर बैठ गयी। राज ने फोन पर अपनी बात खत्म की और खाने का ऑर्डर कर दिया। जिस टेबल पर वो बैठे थे वो काफी बड़ी थी और एक सफ़ेद टेबल क्लॉथ से ढकी हुई थी। ज़ूबी राज के बगल की सीट पर बैठ गयी।

राज ने खाना खाते हुए ज़ूबी को बताया कि उसकी एप्लीकेशन का क्या हाल है। उसने बताया कि जो नया टी.वी चैनल वो शुरू करना चाहता है वो एप्लीकेशन की वजह से रुका हुआ था। उसने बताया कि किस तरह उसने अधिकारियों से बातचीत कर ली है और शायद मामला जल्दी ही सुलझ जायेगा।

ज़ूबी शांति से खाना खाते हुए उसकी कहानी सुन रही थी। पर उसका पूरा ध्यान अपने आप में हिम्मत जुटाने में लगा हुआ था कि किस तरह वो राज से उस टेप की बात करे। डर और खौफ़ के मारे उसकी ज़ुबान सूखी जा रही थी। वोदका के पैग भी उसे राहत नहीं दे पा रहे थे। आखिर में उसने हिम्मत जुटाते हुए अपनी हकलाती ज़ुबान से कहा, “राज मैं हर हाल में वो वीडियोटेप वापस पाना चाहती हूँ।”

“जरूर मिल जायेगी” राज ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा। “अगर तुम मेरी सहायता करोगी तो वो टेप तुम्हें जरूर मिल जायेगी। पर थोड़े समय के बाद... और मैं तुमसे ये वादा करता हूँ कि वो टेप के बारे में ना तो तुम्हारे ऑफिस में किसी को पता चलेगा और ना ही तुम्हारे मंगेतर को... पर तभी तक जब तक तुम मुझे मजबूर ना कर दो।”

ज़ूबी चुपचाप उसकी बात सुनती रही और जैसा उसने सोच रखा था वही हुआ। राज ने टेबल के नीचे से अपना हाथ उसकी गोरी जाँघों पर रख दिया। अचानक राज ने उसे अपने नज़दीक खींचा और अपने होंठ उसके होंठों पर रख कर चूसने लगा। ज़ूबी ने उसे रोकने कि चेष्टा नहीं की। राज नाराज़ ना हो जाये, सोच कर वो उसका साथ देने लगी।

ज़ूबी भी अपना मुँह खोल कर उसकी जीभ को चूसने लगी। अब राज ने अपना दूसरा हाथ उसकी शर्ट में डाल दिया और उसकी चूचियों को मसलने लगा। उसके हाथों के स्पर्श ने ज़ूबी के बदन में एक सिरहन सी दौड़ा दी जिससे उसके निप्पल एक दम सख्त हो गये। राज उसकी आँखों में देखते हुए उसकी चूचियों को जोरों से मसल रहा था। जब उसने वेटर को टेबल के नज़दीक आते देखा तो अपना हाथ हटा लिया। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

राज ने दोनों के लिए एक और ड्रिंक का ऑर्डर दिया। “अपनी टाँगों को थोड़ा फ़ैलाओ” उसने ज़ूबी की टाँगों को सहलाते हुए कहा।

ना चाहते हुए भी ज़ूबी ने अपनी टाँगें फैला दी। राज के हाथ अब उसकी चूत से खेल रहे थे। वो रह रह कर अपनी हथेली से उसकी चूत को दबा देता। ज़ूबी के शरीर में भी गर्मी आ रही थी। इसका सबूत ये था कि उसकी चूत गीली हो चुकी थी। कई बार राज अपनी गीली हुई अँगुलियों को उसकी स्कर्ट से पौंछ चुका था।

ज़ूबी का दिमाग काम नहीं कर रहा था। दिमाग कह रहा था कि वो राज का साथ ना दे, पर बदन की गर्मी और काम वासना उस पर हावी होती जा रही थी। वो जानती थी कि आज की रात राज उसे चोदेगा और उसके पास उसके साथ सोने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। उसे तो हर हाल में चुदवाना था चाहे मन से या बेमन से।

“ओहहहह आहहहह” ज़ूबी के मुँह से सिसकरी निकली। राज अपनी दो अँगुलियाँ उसकी चूत में डाले अंदर बाहर कर रहा था। जैसे-जैसे राज की अँगुली उसकी चूत में घुसती, उतनी ही उसकी वासना और भड़कती। उसकी सिसकरियाँ ये बता रही थी कि अब वो भी चुदवाने कि लिए पूरी तरह तैयार हो गयी है।

राज उसकी हालत देख कर मुस्कुरा रहा था। वो जानता था कि थोड़ी ही देर में ज़ूबी का पानी छूट जायेगा। पर उसका मक्सद ये नहीं था, वो तो उसे बताना चाहता था कि वो अपनी हरकतों से उसे कहीं भी चुदवाने को तैयार कर सकता था।

“ज़ूबी एक काम करो... ये चाबी लो और रूम नंबर २१३ में चली जाओ... और हाँ! जाकर बेड पर रखी ड्रेस और सैंडल पहन लेना जो मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ। मैं थोड़ी देर में आता हूँ।” राज ने उसे चाबी पकड़ाते हुए कहा।

ज़ूबी खड़ी होकर ऊपर रूम में जाने के लिये चल दी। जैसे ही वो खड़ी हुई, उसे अपनी चूत से पानी बहता महसूस हुआ। उसकी जाँघें और चूत पूरी तरह से गीली हो चुकी थी।

राज मुस्कुराते हुए ज़ूबी को पीछे से देख रहा था। उसने देखा कि उसकी स्कर्ट उसके चूत्तड़ की गोलाइयों को नहीं छुपा पा रही थी।

ज़ूबी जब कमरे में दाखिल हुई तो उसे बेड पर एक छोटी सी सफ़ेद पैंटी और उतनी ही छोटी ब्रा नज़र आयी। साथ ही उनसे मैचिंग सफ़ेद रंग के बहुत ही हाई हील के सैंडल रखे थे। इन अंडरगार्मेंट्स को देख कर वो समझ गयी कि राज जानबूझ कर इतने छोटे ले कर आया है ताकि उसके मम्मे और चूत्तड़ साफ़ दिखायी दे सके।

रूम के बीचों बीच खड़े होकर उसने अपने काले हाई हील के सैंडल उतारे और फिर अपनी स्कर्ट की ज़िप खोल दी। उसका स्कर्ट फिसल कर नीचे गिर पड़ा। उसने स्कर्ट को अपनी टाँगों से निकाल कर उतार दिया और फिर अपना टॉप भी उतार दिया। कमरे में चलते एयर कंडीशनर की ठंडी हवा ने एक सिरहन सी भर दी उसके शरीर में।

ज़ूबी कमरे में बिछे कार्पेट पर नंगी ही चहल कदमी कर रही थी। उसने बेड पर से कपड़े और सैंडल उठाये और पहनने लगी। वो समझ गयी थी कि राज उसे अपनी काम वासना की पूर्ति के लिए इस्तमाल करना चाहता है। ज़ूबी ये भी जानती थी कि राज के हाथ जब उसके बदन को सहलाते थे तो अपने जज़बतों को नहीं रोक पाती थी। उसकी भी जिस्मनी इच्छा और बढ़ जाती थी।

ज़ूबी ने जैसे ही अपने कपड़े समेट कर साइड की टेबल पर रखे तो राज को कमरे में दाखिल होते देखा। ज़ूबी ने देखा कि राज ने शराब की बोत्तल अपनी बगल में दबा रखी थी और उसके पीछे दो हट्टे तगड़े आदमी सूट पहने कमरे में आ गये।

“ज़ूबी इनसे मिलो... ये हमारे टी.वी चैनल के नये पार्टनर हैं” राज ने कहा।

“करन ये मेरी वकील ज़ूबी है” राज ने उसका परिचय कराया। ज़ूबी चुप चाप खड़ी थी। उसका मन कर रहा था कि वहाँ से भाग जाये पर जानती थी कि वो ऐसा नहीं कर सकती थी। उसने अपने आप को इतना मजबूर कभी नहीं पाया था। उसकी आँखों में पानी आ गया था। ज़ूबी काँपती टाँगों से साइड में पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी।

राज ज़ूबी के पास आ गया और उसकी चूचियों को मसलने लगा। ज़ूबी ने एक बार चाहा कि वो उसके हाथों को झटक दे पर वो ऐसा कर ना सकी, बल्कि उसने महसूस किया कि राज के हाथों का स्पर्श उसे अच्छा लग रहा है और उसके निप्पल एक बार फिर खड़े हो रहे हैं।

राज ने ज़ूबी को कुर्सी पर से उठाया और उसके बदन को सहलाने लगा। फिर उसने अपने कपड़े उतारे और नंगा हो गया। राज अब खुद कुर्सी पर बैठ गया और ज़ूबी को कंधे से नीचे कर के अपनी फैली जाँघों के बीच बिठा दिया। ज़ूबी का चेहरा राज के लंड से कुछ ही इंच के फ़ासले पर था।

“अब मेरे लंड को अपने मुँह में ले कर चूसो।” राज ने अपना लंड उसके गुलाबी होंठों पर रगड़ते हुए कहा।

ज़ूबी को अपने आप से इतनी शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि वो अपने आँसू बड़ी मुश्किल से रोक पा रही थी। राज उसके साथ ऐसा व्यवहार कर रहा था जैसे वो कोई वेश्या हो, “प्लीज़ मुझे पराये मर्दों के सामने इतना जलील मत करो” ज़ूबी गिड़गिड़ाते हुए बोली।

राज ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया, बस उसे घूरता जा रहा था।

ज़ूबी ने जब देखा कि उसकी बातों का राज पर कोई असर होने वाला नहीं है तो उसने अपने आप को हालात के सहारे छोड़ दिया।

अब ज़ूबी के पास कोई चारा नहीं था, उसने राज के लंड को अपने हाथों में लिया और अपना मुँह खोल कर उसे चूसने लगी। ज़ूबी के माथे पर पसीना आ गया था पर वो अपना मुँह ऊपर नीचे कर के उसके लंड को जोरों से चूसती जा रही थी।

राज ने अपने हाथ उसके सिर और गर्दन पर टिका रखे थे, पर उसकी निगाहें ज़ूबी के चेहरे पर थी जो उसके लंड को चूस रही थी। राज को उसके मुलायम बदन का स्पर्श अच्छा लग रहा था, कैसे वो बीच में अपनी आँखें ऊपर उठा कर उसे देख लेती थी।

जब वो अपनी जीभ को उसके लंड के चारों तरफ़ घुमाने लगी तब राज को महसूस होने लगा कि वो अब झड़ने वाला है। ज़ूबी के एक हाथ ने उसका लंड नीचे से पकड़ा हुआ था और दूसरा हाथ उसकी जाँघों को पकड़े हुए था। ज़ूबी ने उसके पाँव को अकड़ते देखा और वो समझ गयी कि अब राज झड़ने वाला है।

“चूसती रहो... रुको मत” राज ने उसके सिर को और दबाते हुए कहा।

“हे... भगवान... ओहहहह हाँ आआहहहह” कहकर उसका लंड वीर्य की पिचकारी छोड़ने लगा। उसके कुल्हे ज़ूबी के चेहरे पर गड़े हुए थे। उसने उसके सिर को इतना कस कर पकड़ रखा था कि ज़ूबी को मजबूरी में उसका वीर्य निगलना पड़ रहा था।

जैसे ही उसके पाँव थोड़े ढीले पड़े, ज़ूबी ने अपने गुलाबी होंठ उसके लंड से हटाये और घिसटती हुई सोफ़े पर जाकर बैठ गयी।

“ये मैं क्या कर रही हूँ उसे अपने आप से घृणा हो रही थी कि वो ये सब कैसे कर सकती है। पर अभी वो अपनी हालत को संभाल भी नहीं पायी थी कि दो तगड़े मर्दों ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और उसके दोनों मम्मों को भींचने और मसलने लगे। दोनों उसकी चूचियों को इस तरह चूस रहे थे जैसे दो जुड़वां बच्चे अपनी माँ का स्तन चूसते हैं।

तभी ज़ूबी को राज कि आवाज़ सुनायी दी, “आराम से दोस्तों, सबको मौका मिलेगा इसे चोदने का।”

ज़ूबी की आँखें घबड़ाहट में फट सी गयी और उसे अपनी साँसें घुटती सी महसूस हुई, “हाय अल्लाह ये मेरी सामुहिक चुदाई करेंगे” उसने सोचा, “हाय रब्बा, सब मिलकर चोदेंगे मुझे।”

ज़ूबी आँखें फाड़े उन दो मर्दों को अपनी चूचीयाँ चूसते हुए देख रही थी। पर वो इस बात से भी इनकार नहीं कर सकती थी कि उसके निप्पल तन कर खड़े हो गये थे और उसकी चूत उत्तेजना में गीली हो चुकी थी। उसने तिरछी आँखों से देखा कि अब दोनों मर्द अपने कपड़े उतार रहे थे।

ज़ूबी ने अपने छोटे हाथों को उन मर्दों के कंधों पर रखा और उन्हें हटाने की कोशिश करने लगी, “प्लीज़ रुक जाइये, रुक जाइये।” पर उसकी कोशिश नाकामयाब रही। वो दोनों मर्द उसकी चूचियों को चूसे जा रहे थे। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

ज़ूबी का विरोध देख कर राज उसके पास आया और बोला, “ज़ूबी मेरी बात सुनो, तुम्हें इन मर्दों को सहयोग देना होगा? अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो ये तुम्हारे लिए बुरा होगा। मेरे लिए नहीं, तुम्हारे लिए... ये, समझी तुम।”

ज़ूबी की आँखों में आँसू आ गये, उसने राज की आँखों में देखा कि शायद रहम नज़र आ जाये। पर राज की आँखों में रहम नाम की कोई चीज़ नहीं थी। ज़ूबी को मालूम था कि राज की बात मानने के अलावा उसके पास कोई रास्ता नहीं था। उसके दिल ने कहा कि किसी तरह इस रात को गुज़ार लो।

उसे पता था कि उसकी चूत की आज जम कर धुनाई होने वाली है। उसके बदन की ऐसी दुर्गति बनने वाली है जो उसने सपने में भी ना सोची होगी। वो अपने आप में इन सब के लिए हिम्मत जुटाने लगी।

वैसे तो राज को उसकी सहमती कि जरूरत नहीं थी, फिर भी ज़ूबी ने उसकी और देखते हुए अपनी गर्दन हाँ में हिला दी। दोनों मर्द जो उसकी चूंची चूस रहे थे, एक ने उसका हाथ पकड़ कर अपने खड़े लंड पर रख दिया। ज़ूबी समझ गयी कि वो क्या चाहता है और वो उसके लंड को पकड़ कर हिलाने लगी।

राज ने जब ज़ूबी को लंड हिलाते देखा तो उसकी नंगी जाँघों को सहलाते हुए बोला, “अब हुई ना अच्छी लड़की वाली बात।”

तभी दूसरा मर्द उसकी टाँगों के बीच आ गया। उसने देखा कि वो अपने खड़े लंड को उसकी गीली हुई चूत पर रगड़ रहा है। उस मर्द ने उसकी टाँगों को थोड़ा ऊपर उठा कर उसके कुल्हे पकड़ लिए और अपने लंबे मोटे लंड को उसकी चूत में घुसाने लगा। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

“ओहहहहहह मरररर गयीईईईई।” दर्द के मारे वो चींख पड़ी।

“फाड़ दो इसकी चूत को!” राज ने उस मर्द से कहा। राज जानता था कि ये वकील लड़की की चूत इतने लंबे और मोटे लंड की आदी नहीं है। पर वो ये भी जानता था कि इस खिलाड़ी लड़की की चूत बहुत गहरी है, अगर पूरा घुसाया जाये तो उसकी चूत पूरा लंड निगल लेगी।

वो मर्द जोर लगाकर अपने लंड को उसकी चूत में घुसाने लगा और ज़ूबी को ताज्जुब हुआ जब उसकी चूत फ़ैलते हुए उसके लंड को निगलने लगी। तभी दूसरे मर्द ने उसकी चूंची चूसते हुए उसे लिटा दिया। पहले वाला मर्द अब जोरों से उसकी चूत चोद रहा था। वो इतनी बेरहमी से उसे चोद रहा था कि उसकी चूत में एक दर्द सा भरता जा रहा था।

दूसरे मर्द ने उसकी चूचियों को चूसना बंद किया और उसके चेहरे के पास आ गया। अब वो अपने खड़े लंड को उसके होंठों पर रगड़ रहा था। ज़ूबी अपना मुँह खोलना नहीं चाहती थी, पर उसके पास कोई चारा नहीं था। उसने अपना मुँह खोल कर उस मुसल जैसे लंड को अपने मुँह में ले लिया। एक अजीब सी दुर्गंध उसके नथुनों से टकरायी। पर इन सब बातों पर ध्यान ना देकर वो उस लंड को जोरों से चूसने लगी।

ज़ूबी को पता भी नहीं लगा कि कब उसके शरीर के दर्द और घबड़ाहट ने उत्तेजना और मादकता का रूप ले लिया, और वो झड़ने के कगार पर पहुँच गयी।

“ओहहहहह आआआहहहह ओओओओहहहहह” वो सिसकी और उसकी कमसिन और प्यारी चूत ने पानी छोड़ दिया।

जैसे ही उसकी चूत ने पानी छोड़ा, पहले मर्द के लंड ने उसके मुँह में वीर्य की पिचकारी छोड़ दी। ना चाहते हुए भी ज़ूबी को उस कसैले वीर्य को पीना पड़ा। जितनी जल्दी हो सकता था वो उस कड़वे पानी को निगल गयी जिससे उसका स्वाद उसकी जीभ पर ज्यादा देर ना रहे।

दूसरा मर्द उसकी चूत में अपने लंड को अंदर बाहर होते देख रहा था। उसने हमेशा से एक नौजवान लड़की को चोदने का सपना देखा था, और आज उसका वो सपना पूरा हो रहा था। उसका मोटा और लंबा लंड ज़ूबी की चूत के अंदर बाहर होता हुआ उसे बहुत अच्छा लग रहा था। जब उसने ज़ूबी के शरीर को अकड़ते और झड़ते देखा तो वो खुद पर काबू ना रख पाया और उसके लंड ने पानी छोड़ दिया।

उस दूसरे मर्द ने अपने अर्ध-मुर्झाये लंड को उसकी चूत के बाहर खींचा और उसके वीर्य की एक जटा सी बाहर को निकल पड़ी। ज़ूबी ने महसूस किया कि वो वीर्य उसकी नंगी जाँघों पर बह रहा था। वो अजीब नज़रों से उस लंड को देख रही थी और सोच रही थी कि उसकी चूत ने किस तरह इस विशाल लंड को अंदर लिया होगा।

उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। इस भयंकर चुदाई से उसकी साँसें उखड़ चुकी थीं। उस मर्द ने उसे अपनी गोद में उठाया और लेजाकर उसे बिस्तर पर पेट के बल पटक दिया।

ज़ूबी ने महसूस किया कि उसने उसके कुल्हे हवा में उठा दिये और अपना लंड पीछे से उसकी चूत में घुसा दिया। अब वो उसे कुत्तिया कि तरह पीछे से चोद रहा था। ज़ूबी को अपने शरीर के साथ होते इस दुर्व्यवहार पे इतनी शरम आ रही थी कि उसने अपना चेहरा बिस्तर की चादर में छुपा लिया।

पर थोड़ी ही देर में उसका शरीर उसके धक्कों के साथ आगे पीछे हो कर साथ देने लगा। उस मर्द ने उसकी कमर में हाथ डाला, “गुड़िया थोड़ा घुटनों के बल हो जाओ जब ज़ूबी ने वैसा किया तो उसने उसकी चूचियों को पकड़ लिया और मसलने लगा।

जिस तरह से वो उसकी चूचियों को मसल रहा था, ज़ूबी को अपने आप से नफ़रत सी हो रही थी पर उसका शरीर था जो उसकी सोच के विपरीत चल रहा था। उसके निप्पल इतने नाज़ुक थे कि थोड़ी रगड़ा मसली से ही तन कर खड़े हो गये और उसकी टाँगें खुद-ब-खुद उत्तेजना में फ़ैल गयी।

वो मर्द अब एक नयी ताकत से उसे चोद रहा था। वो ज़ूबी कि गाँड के छेद को देख रहा था जो उसके हर धक्के से खुल बंद हो रही थी। उसने अपनी एक अँगुली उसकी गाँड के छेद में डाली और दुगनी ताकत से धक्के लगाने लगा। दस पंद्रह धक्के मारने के बाद उसके लंड ने पानी छोड़ दिया।

एक मर्द उसे चोद कर अलग होता और दूसरा अपने लंड को उसकी चूत में पेल देता। वो अब तो गिनती भी भूलने लगी थी कि उसे कितनी बार किसने चोदा। वो बेहोश सी होने लगी थी।

उसे इतना पता था कि एक लंड उसकी चूत के अंदर बाहर हो रहा है। उसने अपनी अधखुली आँखों से देखा कि होटल के रूम सर्विस स्टाफ से एक जवान लड़का शराब और नाश्ता लेकर रूम में दाखिल हो रहा था। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

उस रूम अटेंडेंट ने जब ज़ूबी को इस तरह से चुदते देखा तो उसने अपनी आँखें शरम से झुका ली।

“जो देखा वो पसंद आया क्या राज ने उस लड़के से पूछा।

“हाँ सर, ये बहुत सुंदर है, ये किसके लिए काम करती है? मैंने इसे पहले कभी यहाँ नहीं देखा” लड़के ने जवाब दिया।

ज़ूबी समझ गयी कि वो लड़का उसे वेश्या समझ रहा है।

“वैसे ये लड़की कोई रंडी नहीं है... बल्कि ये इस शहर की एक वकील है” राज ने उस लड़के से कहा।

वो लड़का गहरी नज़रों से ज़ूबी को देख रहा था। देख रहा था कि किस तरह एक मूसल लंड उसकी चूत के अंदर बाहर हो रहा है।

“क्या तुम्हारे पास थोड़ा समय है, मैं तुमसे कुछ बात करना चाहता हूँ राज ने उस वर्दी धारी लड़के से कहा।

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ज़ूबी होटल रूम के बाथरूम के आइने के सामने खड़ी थी। वो इस तरह झुकी हुई थी कि उसकी चूचियाँ लटक रही थी और उसके भरे और मांसल चूत्तड़ों के पीछे वो रूम अटेंडेंट खड़ा था।

वो लड़का शायद उन्नीस बीस साल का होगा, और शायद उसे चुदाई का अनुभव नहीं था, पर उसका लंड एक दम घोड़े के लंड कि तरह सवारी करने को तैयार था। उसने ज़ूबी से अपना लंड खुद की चूत में डालने को कहा तो ज़ूबी ने उसके लंड को पकड़ कर अपनी चूत के मुँह पर रख दिया।

उस अनाड़ी लड़के ने एक ही धक्के में अपना लंड उसकी चूत में घुसाने की कोशिश की और उसका लंड फिसल कर रह गया। उस लड़के ने फिर अपना लंड उसकी चूत के दीवार पर लगाया और इस बार अंदर घुसा दिया। ज़ूबी सिसकी और उसकी चूत ने उसके लंड को जैसे गले लगा लिया। दो धक्कों में उसका लंड पूरा चूत के अंदर था।

जब उसका लंड पूरा अंदर घुस गया तो वो एक कुशल घुड़सवार की तरह उसकी चूत की सवारी करने लगा। ज़ूबी भी उसके धक्कों का साथ अपने कुल्हे आगे पीछे कर के दे रही थी।

उस लड़के ने ज़ूबी के चेहरे पर आये उसके बलों को हटाते हुए कहा कि वो उसका चेहरा आइने में देखना चाहता है। ज़ूबी भी उसे देख रही थी कि किस तरह वो अपने लंड को उसकी चूत के अंदर बाहर कर रहा था। सबसे बड़ी बात कि बाथरूम के खुले दरवाजे से रूम में बैठे तीनों मर्द उसे चुदवाते देख रहे थे।

वो जवान लड़का उसके कुल्हों को पकड़ कर इतने करारे धक्के मार रहा था कि ज़ूबी की चूत ने थोड़ी देर में ही पानी छोड़ दिया। वो लड़का भी और दो धक्के मार कर उसकी चूत में झड़ गया।

ज़ूबी इस कदर थक गयी थी कि वो अपनी कमजोर टाँगों से खड़ी नहीं हो पायी और बाथरूम की ज़मीन पर लुढ़क गयी। उसकी हालत बेहोशी जैसी थी। तभी उसे राज की आवाज़ सुनायी दी, “ज़ूबी एक अच्छे मेहमान नवाज़ की तरह इसके लौड़े को चाट कर साफ़ करो।”

बिना कुछ कहे ज़ूबी ने अपना मुँह खोला और उस लड़के का लंड अपने मुँह में ले कर चूसने लगी। जब उस लड़के का लंड एक दम साफ़ हो गया तो उसने महसूस किया कि किसी के हाथों ने उसे उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया है। उस रात कितनी बार किसने उसे चोदा उसे याद नहीं था और वो एक गहरी नींद में सो गयी।

कईं घंटे तक ज़ूबी सोती रही। पूरी रात मर्दों ने उसे रगड़ा और मसला था। पूरा शरीर दर्द के मारे कराह रहा था। वो उठी और नहाने के लिये बाथरूम में घुस गयी। वो अपने शरीर से गुनाहों के उन निशानों को मिटाने की कोशिश करने लगी जो उससे जबरदस्ती करवाये गये थे।

ज़ूबी का पूरा शरीर दर्द के मारे कराह रहा था। उसकी चूत सूज कर फूल गयी थी। लंड चूस-चूस के उसके मुँह में और जबड़ों में भी दर्द हो रहा था। उसने गरम पानी से स्नान किया जिससे उसके बदन को राहत मिल सके। अपने बदन को अच्छी तरह टॉवल से पोंछने के बाद वो बेडरूम में आ गयी।

बेडरूम में आते ही उसके दिल की धड़कनें तेज हो गयी। उसके कपड़े कहीं दिखायी नहीं दे रहे थे। शायद दूसरे मर्द उसकी चुदाई कर रहे थे तब राज उसके कपड़ों को अपने साथ ले गया था। राज के द्वारा लाये हुए सफ़ेद हाई हील के सैंडल जरूर वहाँ मौजूद थे क्योंकि पुरी रात चुदते समय वो उन्हें पहने हुए थी और अभी नहाने के पहले ही उसने वो उतारे थे।

ज़ूबी के माथे पर पसीना आ गया। अपने आपको बेइज्जती से बचाने के लिये उसे कुछ सोचना होगा। ज़ूबी ने घड़ी की तरफ़ देखा। सुबह के साड़े सात बज चुके थे। ज़ूबी जानती थी कि वो किसी को अपनी मदद के लिये नहीं बुला सकती थी, वरना उसे कईं सवालों के जवाब देने पड़ सकते थे।

अपने किसी परिचित को बुलाने के बजाय उसने उस नौजवान लड़के को बुलाना उचित समझा जो रात को उसे चोद चुका था। ज़ूबी ने फोन उठाया और रूम सर्विस का नंबर मिलाया। वो अल्लाह से दुआ करने लगी कि वही लड़का फोन उठाये। उसकी किस्मत ने साथ दिया और उसी लड़के ने फोन उठाया। ज़ूबी ने उसे अपने कमरे में आने के लिये कहा।

ज़ूबी रात की घटना याद कर रही थी कि किस तरह वो उस लड़के के सामने घुटनों के बल एक रंडी की तरह उसके लंड को चूस रही थी। ज़ूबी जो एक कामयाब वकील थी... अपने हालत पर उसे रोना आ गया। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। ज़ूबी ने पैरों में वही सफ़ेद सैंडल पहने और कस कर अपने बदन को टॉवल से ढका और दरवाजे के छेद से देखने लगी। जब उसे तस्सली हो गयी कि आने वाला लड़का रात वाला ही है तो उसने दरवाज़ा खोल दिया। वो नौजवान कमरे के अंदर आ गया।

ज़ूबी उस नौजवान लड़के को, जो सुबह की रोशनी में और भी जवान और गठीला लग रहा था, अपनी दास्तान सुनाने लगी। ज़ूबी की बात सुनकर उस लड़के का लंड तन कर खड़ा हो गया। वो ज़ूबी की बात सुनकर गरमा गया था।

“देखो मेरी डयूटी सुबह दस बजे खत्म होती है, उसके बाद तुम कहो तो मैं तुम्हें कहीं ले जाऊँगा।” उस लड़के ने ज़ूबी को घूरते हुए कहा।

ज़ूबी उसकी बात सुनकर थोड़ा निराश हो गयी, “मैं इतनी देर तक नहीं रुक सकती, क्या कोई तरीका नहीं है कि हम यहाँ से जल्दी निकल सकें” लगभग रोते हुए वो बोली।

“मेरी नौकरी जा सकती है” उसने जवाब दिया, “और मैं अपनी नौकरी खोना नहीं चाहता।”

ज़ूबी की आँखों में आँसू आ गये, “प्लीज़ मेरी मजबूरी को समझो, तुम जो कहोगे मैं करने को तैयार हूँ।” उसे पता था कि जो वो कह रही है उसका मतलब कुछ भी हो सकता था, पर उसके पास और कोई चारा भी नहीं था।

“कुछ भी करोगी उसने पूछा। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

“हाँ कुछ भी...” ज़ूबी ने कहा।

वो लड़का ज़ूबी के पास आया और ज़ूबी के बदन से लिपटे टॉवल की गाँठ खोल कर उसे ज़मीन पर गिरा दिया। ज़ूबी सीधी खड़ी थी और साथ ही उसकी चूचियाँ भी तन कर खड़ी थी। उसके भरे-भरे मम्मे उसकी साँसों के साथ उठ बैठ रहे थे। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

ज़ूबी ने देखा कि उस लड़के के हाथ अब उसकी टाँगों के बीच आ गये और उसकी अंगुलियाँ उसकी चूत के छेद को तलाश कर रही थी। छेद मिलते ही उसने अपनी अंगुलियाँ अंदर घुसा दी। ज़ूबी ने अपनी टाँगें थोड़ी फैला दी जिससे उसकी अँगुली आसानी से अंदर घुस सके।

ज़ूबी ने सहारे के लिये उस लड़के के कंधे को पकड़ लिया और वो उसकी चूत को अपनी अँगुली से चोदने लगा। थोड़ी ही देर में उसकी चूत पानी छोड़ने लगी। उसकी आँखें पूरी कामुक्ता में बंद थी और वो इस हर लम्हे का मज़ा ले रही थी।

उस लड़के को अपने नसीब पर विश्वास नहीं हो रहा था। आज तक उसने सिर्फ़ मोहल्ले की कुछ लड़कियों को ही चोदा था। उसने अपने एक हाथ से उसके मम्मे पकड़ लिये और उन्हें जोरों से मसलने लगा।

आज वो जिस औरत को चोदने जा रहा था वो सही में भरी पूरी औरत थी, सुंदर, गठीला शरीर और गरम। “मेरा लंड बाहर निकालो” उसने ज़ूबी से कहा।

ज़ूबी ने अपनी आँखें खोली और उसकी पैंट की ज़िप को तलाश करने लगी। उसने पहली बार नीचे देखा। लड़के का हाथ उसकी फैली हुई चूत पर था और उसकी अंगुलियाँ उसकी चूत के अंदर बाहर हो रही थी।

ज़ूबी ने उसकी पैंट और अंडरवीयर को उसके घुटनों तक नीचे खिसका दिया। ज़ूबी अब उसके लंड को अपने हाथों में पकड़ कर सहला रही थी। उस लड़के ने अपनी अँगुली उसकी चूत से निकाली और उसे बिस्तर की ओर घसीट कर ले आया।

“चलो बिस्तर पर लेट जाओ” उसने कहा।

ज़ूबी बिस्तर पर पीठ के बल लेट गयी और अपनी टाँगें पूरी तरह से फैला दी। उसने अपनी बांहें इस तरह से फ़ैलायी कि जैसे अपने महबूब को बुला रही हो। उस लड़के ने अपने बाकी के सारे कपड़े उतार दिये और उछल कर उसकी टाँगों के बीच आ गया। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

ज़ूबी को अपने आप पर शरम आ रही थी, पर अँगुली की चुदाई ने उसके अंदर भी आग भर दी थी। ज़ूबी ने उसके तने हुए लंड को देखा और उसे पकड़ कर अपनी चूत के छेद पर लगा दिया। वो थोड़ी देर उसे अपनी चूत पर रगड़ती रही और जब वो उसके रस से पूरी तरह गीला हो गया तो अपनी कमर ऊपर उठा कर उसे अंदर लेने लगी।

जैसे ही लड़के ने धीरे से धक्का लगाया, ज़ूबी सिसक पड़ी। वो अब धीरे धीरे धक्के लगा कर ज़ूबी को चोद रहा था। उसने ज़ूबी की टाँगें पकड़ कर अपनी कमर के इर्द गिर्द कर लीं और जोरों से धक्के लगाने लगा।

“ऊऊऊऊऊहहह हाँआँआँ ओओहहहह आआआआह ऊऊओहह।” ज़ूबी सिसक रही थी। उसने उस लड़के के चेहरे को अपने पास खींचा और उसके सूखे होंठों को चूसने लगी। उस लड़के ने भी अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी जिसे ज़ूबी अपनी जीभ से जीभ मिलाकर चूसने लगी और साथ ही उसके लंड को अपनी चूत में जकड़ने लगी।

वो लड़का इतना उत्तेजित और गरम था कि उसका लंड कुछ देर में ही झड़ गया। पानी छूटने के बाद जैसे ही लड़के ने अपना लंड बाहर निकाला ज़ूबी को निराशा हुई कि उस लड़के ने उसका पानी नहीं छुड़ाया था। पर वो कर भी क्या सकती थी। उसे इस लड़के से अपना काम निकालना था।

“चलो तैयार हो जाओ” लड़का अपने कपड़े पहनते हुए बोला, “हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है।”

उस लड़के ने उसे अपनी होटल यूनिफॉर्म का कोट पकड़ाया जो सिर्फ़ ज़ूबी के चूत्तड़ों तक ही आ सकता था। ज़ूबी जल्दी से बिस्तर से उठी और उसने वो कोट पहन लिया। ज़ूबी ने जैसे ही कोट पहना, उसे लगा उस लड़के का वीर्य उसकी चूत से उसकी टाँगों पर बह रहा है और ज़ूबी ने जल्दी से उसे अपने हाथों से पौंछ दिया।

“मेरी गाड़ी होटल के पार्किंग में खड़ी है। तुम पीछे वाली लिफ्ट से नीचे आ जाओ, वहाँ तुम्हें कोई नहीं देख सकेगा” उसने कहा।

ज़ूबी इतनी ऊँची हील के सैंडल पहने होने के बावजूद हॉलवे में दौड़ती हुई पीछे की लिफ्ट की ओर लपकी। लड़का भी उसके पीछे-पीछे आ गया। दोनों जल्दी से नीचे पार्किंग में पहुँचे और उस लड़के की पुरानी सी गाड़ी में बैठ गये। जब उनकी गाड़ी होटल से काफी दूर आ गयी तो उस लड़के के हाथ ज़ूबी के पहने हुए कोट के बटन को ढूंढने लगे।

थोड़ी ही देर में उस लड़के ने कोट के बटन खोल दिये और उसकी चूचियों को मसलना शुरू कर दिया। ज़ूबी के निप्पल एक बार फिर तन गये।

गाड़ी चलती रही और थोड़ी देर बाद किसी गली में जाकर रुक गयी। ज़ूबी ने खिड़की के बाहर देखा तो गाड़ी किसी अंजान जगह पर खड़ी थी।

“ये कहाँ आ गये हम, ये मेरा घर तो नहीं ज़ूबी ने पूछा।

“सिर्फ़ दो मिनट रुको...” उस नौजवान ने जवाब दिया। वो अपना मोबाइल फोन निकाल कर कोई नंबर मिलाने लगा।

“हाँ नीचे आ जाओ... यार मैं सच कह रहा हूँ... जल्दी से नीचे आओ।”

ज़ूबी ने उस लड़के को देखा और उसकी आँखें फिर नम हो गयी। फिर एक बार वो समझ गयी कि उसे धोका दिया जा रहा है। “प्लीज़” उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “तुमने जो भी कहा मैंने किया, प्लीज़ मुझे मेरे घर पर छोड़ दो।”

उस लड़के ने उसकी ओर देखा, “हाँ मैं जानता हूँ पर जैसे तुम्हारी और मेरी बात हुई थी, बस थोड़ा समय लगेगा।”

उसी समय गाड़ी के आगे का दरवाज़ा खुला और कोई अंदर आ गया। ज़ूबी थोड़ी देर तक तो उसे घूरती रही फिर अपनी सीट पर खिसक कर उसके लिये जगह बनाने लगी। कोट के अंदर नंगी होने की वजह से उसकी नंगी जाँघें और कुल्हे आने वाले मर्द को साफ़ दिखायी दे रहे थे।

जब उस मर्द ने ज़ूबी को इस हालत में देखा तो वो खुशी से उछल पड़ा, “यार तुम झूठ नहीं कह रहे थे।”

“देखा मैंने सही कहा था ना तुमसे उस नौजवान ने आने वाले लड़के से कहा। उस नौजवान ने ज़ूबी के कोट के बटन खोल दिये जिससे उसकी भरी और तनी हुई चूचियाँ नज़र आने लगी। आने वाले नौजवान की नज़र जैसे ही ज़ूबी की नंगी चूचियों पर पड़ी, उसका लंड तन कर खड़ा हो गया।

“प्लीज़...!” ज़ूबी उस होटल वाले नौजवान से गिड़गिड़ाते हुए बोली, “प्लीज़ तुमने वादा किया था।”

“देखो मेरी बात सुनो उस नौजवान ने कहा, “तुमने कहा था कि तुम कुछ भी करने को तैयार हो, तुम्हें तुम्हारे घर जाना है कि नहीं

ज़ूबी कुछ जवाब नहीं दे पायी।

“मैंने जो कहा वो करना चाहती हो कि नहीं? नहीं तो मैं तुम्हें अभी इस वक्त गाड़ी से उतार दूँगा।” उस नौजवान ने उसे धमकाते हुए कहा।

“मैं नहीं सह सकती... प्लीज़...।”

पर ज़ूबी की आवाज़ उसके हलक में दब कर रह गयी। वो नौजवान उसकी चूचियों को मसले जा रहा था। ज़ूबी उस नये नौजवान से थोड़ा हट कर बैठी थी। उस नौजवान ने शॉट्‌र्स और टी-शर्ट पहन रखी थी। उस लड़के ने ज़ूबी के हाथ को पकड़ा और अपने खड़े लंड पर रख दिया।

“अच्छा है ना कहकर उस लड़के ने ज़ूबी के हाथ को अपने लंड पर दबा दिया।

तभी ज़ूबी ने उस होटल के लड़के का हाथ अपने कंधे पर महसूस किया, “तुम इसके लंड को चूसती क्यों नहीं हो

अपमान और आत्मग्लानि की एक लहर सी दौड़ गयी ज़ूबी के शरीर में। ये दोनों क्या उसे कोई दो टके में बिकने वाली रंडी समझते थे। पर ज़ूबी के पास कोई चारा नहीं था। अगर ये दोनों उसे इस तरह नंगा सड़क पर छोड़ देते तो उसकी काफी बदनामी होती। वो बरबाद हो जाती।

ज़ूबी ने देखा कि आने वाला नौजवान अपनी सीट पर थोड़ा कसमसा रहा है और अपनी शॉट्‌र्स नीचे खिसका रहा है। ज़ूबी समझ गयी कि उसे ये सब करना ही पड़ेगा।

होटल वाले नौजवान ने उसके कुल्हों को सहलाते हुए कहा, “चलो अब चूसो भी!”

ज़ूबी ने घूम कर देखा कि एक लंबा और मोटा लंड उसके चेहरे के सामने फुंकार मार रहा था। उसे घृणा तो बहुत आयी पर मजबूर होकर उसने अपना मुँह खोला और उस लंड को अपने मुँह में लिया। शायद आज के बाद उसकी हालत सुधर जाये।

उस आने वाले लड़के ने अपने हाथ ज़ूबी के सिर पर रख दिये और उसके सिर को अपने लंड पर ऊपर नीचे होते देखने लगा। ज़ूबी का एक हाथ उसके लंड को पकड़े हुए था और दूसरा हाथ उसकी गोलियों को सहला रहा था।इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

उस होटल वाले नौजवान ने गाड़ी चला दी थी। ज़ूबी उस नये नौजवान का लंड चूस रही थी और गाड़ी शहर कि सड़कों पर ऐसे ही चल रही थी।

वैसे तो ज़ूबी उस नौजवान के लंड को बड़े मन से चूस रही थी, पर आखिर वो भी इंसान थी। धीरे-धीरे उसके शरीर में भी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। उसने महसूस किया कि किसी के हाथ उसकी जाँघों से होते हुए उसकी चूत से खेल रहे हैं। फिर दो अंगुलियाँ उसकी चूत के अंदर बाहर होने लगी। उसे विश्वास था कि ये अँगुलियाँ जरूर उस होटल वाले नौजवान की होंगी।

“ओहहहहह हाँआँआँ आआआआँआँ” ज़ूबी के मुँह से एक सिसकरी निकल पड़ी पर वो उस नौजवान के लंड को चूसती रही। उस लड़के ने तभी अपने कुल्हे उठाये और अपना वीर्य ज़ूबी के मुँह में छोड़ दिया।

“हम पहुँच चुके हैं उस नौजवान ने कहा।

ज़ूबी ने खिड़की से बाहर अपने इलाके को पहचाना, पर उस लड़के के लंड को अपने मुँह से बाहर निकालने की बजाय उसने उसके लंड को अपने गले तक ले लिया। थोड़ी देर तक अपने मुँह को ऊपर नीचे कर के उसे चूसने के बाद उस लंड को बाहर निकाल दिया और नौजवान की और देख कर मुस्कुराने लगी।

होटल वाले नौजवान ने दरवाज़ा खोला तो ज़ूबी उछल कर नीचे उतर गयी और अपने घर की तरफ़ दौड़ पड़ी। बड़ी मुश्किल से उसने दरवाज़ा खोला। उसे अपनी चूत से पानी बहता महसूस हो रहा था। बड़ी मुश्किल से वो अपने जज़बतों पर कंट्रोल कर पायी थी।


अध्याय-३


ज़ूबी के लिये आज का दिन उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दिन था। आज उसका निकाह था। ज़ूबी ने पिछले कई महीने अपने शरीर पर मेहनत कर अपने शरीर को काफी कसरती और सुंदर बनाया था। उसने अपने शरीर को इस तरह ढाल दिया था जिससे उसके मंगेतर को रत्ति भर भी शक ना होने पाये कि वो पिछले कई महीनों से किन हालातों से गुज़र रही है।

आखिर रसमों की घड़ी आ ही गयी थी। ज़ूबी अपना समय अपने रिश्तेदारों और परिवार वालों के साथ बिता रही थी और जान रही थी कि हर तैयारी पूरी तरह से हो गयी है कि नहीं। उसने अपने बालों को अच्छी तरह गुंथा हुआ था और वो अपने कमरे में अपनी अम्मी और दादी के साथ बैठी थी।

एक घंटा रह गया था निकाह की रसम के लिये। वो अपना शादी का जोड़ा पहनने की तैयारी करने लगी। गुलाबी रंग का जोड़ा, उसने खास तौर पर ऑर्डर देकर बनवाया था।

ज़ूबी अपने चेहरे का मेक-अप कर रही थी कि तभी उसके कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। उसकी नौकरानी ने दरवाजा खोला। दरवाजे पर मिस्टर राज खड़े थे। ज़ूबी वैसे तो उन्हें शादी पर बुलाना नहीं चाहती थी, पर उसने सोचा कि शायद उसके शौहर से मिलने के बाद राज का व्यवहार उसके प्रति शायद बदल जाये, और उसे वो सब करने पर मजबूर ना करे जो वो नहीं करना चाहती है।

राज एक बहुत ही महंगा सूट पहने हुए था। उसके हाथ में एक पैक किया हुआ तोहफा था और उसके साथ ज़ूबी की उम्र की ही एक लड़की थी।

“हाय, ज़ूबी राज ने कमरे में कदम रखते हुए कहा, “शादी से पहले मैं तुमसे मिलकर तुम्हें मुबारकबाद देना चाहता था।”

“आइये, कैसे हैं आप ना चाहते हुए ज़ूबी ने मुस्कुराते हुए कहा। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

राज ने कमरे में आकर सभी को अपना परिचय दिया और उन्हें बताया कि ज़ूबी ने किस तरह उसकी कंपनी की मदद की है। जब उसने कमरे में मौजूद सभी सदस्यों से ये कहा कि उसे ज़ूबी से कंपनी के बारे में कुछ खास बातें करनी हैं तो सभी चौंक पड़े।

“मिस्टर राज! शायद आप मज़ाक कर रहे हैं ज़ूबी ने थोड़ा हंसते हुए कहा, “आपको पता है ना कि आज मेरा निकाह है।”

“मैं जानता हूँ ज़ूबी, पर सिर्फ़ दस मिनट लगेंगे। शादी के बाद तुम अपने हनीमून पर चली जाओगी और मैं इस समस्या के विषय में तुमसे कम से कम तीन हफ़्तों तक बात नहीं कर पाऊँगा। मुझे आज ही तुमसे बात कर के इस समस्या का हल निकालना है राज ने उसे समझाते हुए कहा।

ज़ूबी राज के बारे में अच्छी तरह जानती थी। एक बार जो वो कह देता था वो कर के रहता था। फिर ज़ूबी बात को बढ़ाना भी नहीं चाहती थी। एक अनजाना डर सा उसके दिल में था, पता नहीं राज क्या कर बैठे।

ज़ूबी की माँ को ज़ूबी की हालत का अंदाज़ा नहीं था, और ना ही उसे राज की या उसकी कंपनी की समस्या से कोई लेना देना था।

“मिस्टर राज!” ज़ूबी की अम्मी ने कहा, “मैं ये कहने पर मजबूर हूँ कि आज आप नाजायज़ बात कर रहे हैं, कम से कम आज के दिन तो ज़ूबी को आप काम से दूर रखें।”

राज ने ज़ूबी की और देखा, “ठीक है ज़ूबी मैं तुम्हें आज के दिन कोई काम करने पर मजबूर नहीं करूँगा, पर ये टेप मैं यहाँ छोड़े जा रहा हूँ, इसे अपनी अम्मी को ज़रूर दिखाना। इसमें हमारी कंपनी की तरक्की की कहानी है राज ने एक टेप अपनी जेब से निकाल कर टेबल पर रख दी।

राज की ये हर्कत देख कर ज़ूबी तो मानो पत्थर की मुरत बन गयी। उसने तुरंत अपनी हालत पर काबू पाया।

“अम्मी मैं एक वकील हूँ और आपको क्या मालुम कि वकील का पेशा क्या होता है। माना आज मेरा निकाह है पर मेरा काम मेरे निकाह से ज्यादा अहम है ज़ूबी ने अपनी अम्मी को समझाते हुए कहा, “प्लीज़ एक मिनट मुझे मिस्टर राज से बात कर लेने दिजिये।”

ज़ूबी ने इशारे से राज को अपने पास बुलाया और कमरे के एक कोने में ले जाकर बात करने लगी।

राज ज़ूबी के पास पहुँचा, “ज़ूबी मैं जानता हूँ कि ये सही नहीं है, पर मुझे तुमसे कुछ अकेले में बात करनी है।”

ज़ूबी की समझ में नहीं आ रहा था कि राज को क्या जवाब दे। कभी वो अपने हाथ में पकड़े उस विडियो टेप को देखती और कभी कमरे में खड़े सभी लोगों को।

“ठीक है ज़ूबी ने कमरे में खड़े सभी लोगों से कहा, “प्लीज़ आप सभी लोग कुछ देर के लिये बाहर जायें, मुझे मिस्टर राज से अकेले में कुछ जरूरी बातें करनी हैं।”

ज़ूबी ने सभी को कमरे के बाहर जाने का इशारा किया, “प्लीज़ आप सभी समझें... ये काम बहुत जरूरी है।” राज के साथ आयी लड़की ने सभी को कमरे के बाहर निकाला और फिर कमरे को अंदर से बंद कर दिया।

जैसे ही उस लड़की ने दरवाजा बंद किया, राज के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी।

ज़ूबी कमरे में खड़े लंबे चौड़े राज को देख रही थी। वैसे तो राज कईं बार उसे चोद चुका था, पर वो सोच रही थी कि क्या आज उसकी शादी के दिन भी राज उससे यही करवाना चाहेगा। वो अपने मेक-अप और अपने कपड़ों के बारे में सोच रही थी। ये सब सोचते हुए उसे रोना आ रहा था पर वो रोकर अपना दिन बरबाद नहीं करना चाहती थी।

“मिस्टर राज! धन्यवाद कि आप समय निकालकर शादी में आयेज़ूबी समय की नज़ाकत को समझती हुई बोली।

“ज़ूबी आज से बड़ा शुभ दिन क्या हो सकता है राज ने कहा, “मैं तो जूली को ये दिखाने लाया था कि तुम कितनी सुंदर हो और तुम्हारा शौहर कितना खुशनसीब है जो उसे तुम्हारी जैसी बीवी मिल रही हैराज जूली की ओर देखते हुए बोला, “क्यों मैं ठीक कह रहा हूँ ना जूली।”

“हाँ राज! वाकय में ज़ूबी काफी खूबसूरत और सैक्सी है जूली अपने होंठों पर ज़ुबान फेरते हुए बोली।

“पर हमारी कितनी बदकिस्मती है कि हमारे पास पूरी रात नहीं है राज ने कहा।

राज की बात सुनकर ज़ूबी सोच में पड़ गयी, “हाय अल्लाह! ये सही में मुझसे आज के दिन वो सब करवाना चाहता है।”

“मिस्टर राज! आज मेरा निकाह है... प्लीज़ आज के दिन तो मुझसे ये सब मत करवाइये।”

“ज़ूबी आज तुम्हारा निकाह है, इसी लिए तो मैं ये सब तुम्हारे साथ करना चाहता हूँ उसने जवाब दिया, “मैं माफी चाहता हूँ, पर ये मेरी सोच है कि तुम्हारे निकाह के दिन मैं पहला मर्द होना चाहता हूँ जो तुम्हारी चुदाई करेगा। मैं चाहता हूँ कि जब तुम निकाह की रस्म में बैठो तो मेरा वीर्य तुम्हारी चूत से बहता रहे। अब अगर तुम चाहती हो कि घर में आये सारे मेहमान तुम्हारी ये वीडियो कैसेट ना देखें तो जल्दी से अपना लहँगा उठाओ और मेरे लंड के लिये तैयार हो जाओ।”

“सैंडल तो बड़ी प्यारी और सैक्सी पहनी है दुल्हन रानी ज़ूबी की गुलाबी रंग की हाई हील की सैंडल की तरफ इशारा करते हुए जूली बोली।

ज़ूबी अपने आपको फ़िर काफी विवश पा रही थी। वो ना तो हाँ कर सकती थी ना ही ना। ज़ूबी डर और अपमान के मारे बुरी हालत में थी। पर वो जानती थी कि उसे ये सब करना पड़ेगा। वो राज की धमकी से डर सी गयी थी। जैसे ही जूली ने उसके लहँगे को उठाया ज़ूबी ने अपनी सैंडल उतारने की कोशिश की।

जैसे ही ज़ूबी अपनी सैंडल उतारने के लिए झुकी तो जूली ने उसे रोक दिया और उससे कहा, “सैंडल पहनी रहो... तुम्हारे पैरों में जंच रहे हैं... अब ऐसा करो तुम टेबल को पकड़ कर घोड़ी बन जाओ, मैं तुम्हारे इस घाघरे को अच्छी तरह से तुम्हारी कमर तक उठा देती हूँ जिससे ये खराब ना हो।”

जूली ने ये सब इतनी अच्छी तरह से कहा था कि ज़ूबी के पास उसकी बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं था। वो घूमी और दोनों हाथों से टेबल को पकड़ कर घोड़ी बन गयी। उसने महसूस किया कि जूली ने उसके घाघरे को उसकी कमर तक उठा दिया है और अब पीछे से उसके बदन को सहला रही है।

“थोड़ा नीचे झुको मेरी गुड़िया जूली ने हल्के दबाव से उसे नीचे झुक दिया। वो सोच रही थी कि कमरे के बाहर खड़े उसके परिवार वाले और रिश्तेदार क्या सोच रहे होंगे कि उन्हें बंद कमरे में इतनी देर क्यों लग रही है।

ज़ूबी की चिकनी और गोरी टाँगें कमरे की दूधिया रोशनी में चमक रही थी। उसके कुल्हे और चूत एक सिल्क की सफ़ेद पैंटी से ढकी हुई थी। ज़ूबी का ये नज़ारा किसी भी मर्द को उत्तेजित करने के लिए काफी था। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

राज ने महसूस किया कि उसका लंड पैंट के अंदर तनने लगा है। ये सोच कर तो उसका लंड और खड़ा हो गया कि ये नयी नवेली दुल्हन आज शादी के दिन किसी और मर्द से चुदवाने जा रही है।

राज ये सब सोचते हुए अपने लंड को पैंट के ऊपर से मसल रहा था। वहीं जूली ने धीरे से अपनी अँगुलियाँ ज़ूबी कि पैंटी में फँसायी और उसे उसके सैंडलों तक नीचे खिसका दी। फिर उसने ज़ूबी का एक-एक पैर उठा कर वो पैंटी निकाल दी। वो पैंटी उतार कर उसने उसे राज को पकड़ा दी और राज ने उसे अपने कोट की जेब में डाल दी।

ज़ूबी के पीछे खड़े होकर राज ने जूली को इशारा किया। उसका इशारा पा कर वो लड़की अब ज़ूबी के चूत्तड़ों को सहलाने लगी।

“अपनी टाँगों को थोड़ा और फ़ैलाओ रानी जूली ने ज़ूबी से कहा।

ज़ूबी के मुँह से एक हल्की सी हुंकार निकली और उसने अपनी टाँगें थोड़ी सी फैला दी जिससे उसकी उभरी हुई चूत अब साफ़ दिखायी दे रही थी।

जूली के हाथ अब ज़ूबी की टाँगों के बीच आ गये। जूली अब अपने हाथ ज़ूबी की बिना झाँटों की साफ़ और चिकनी चूत पर फिराने लगी।

ज़ूबी को अपनी इस अवस्था पे काफी शरम आ रही थी। वो सोच रही थी कि तकदीर भी उसके साथ कैसे खेल खेल रही थी। आज ही उसके निकाह के दिन वो किसी कुत्तिया कि तरह किसी दूसरे मर्द से चुदवाने जा रही थी।

तभी उसने किसी मर्दाने हाथों को अपने चूत्तड़ पर महसूस किया। ज़ूबी ने अपनी गर्दन घुमा कर देखना चाहा कि उसके पीछे क्या हो रहा है। राज ठीक उसके पीछे खड़ा था। उसकी पैंट और अंडरवीयर उसके घुटनों तक नीचे खिसकी हुई थी। उसका तन्नाया हुआ लंड ठीक उसकी चूत को मुँह किये खड़ा था। जूली अब उसके लंड को उसकी चूत पर लगा रही थी।

जूली राज के लंड को ज़ूबी की चूत पर ऊपर नीचे कर के घिस रही थी। राज ने थोड़ा सा दबाव लगाते हुए अपने लंड को ज़ूबी की चूत में घूसा दिया। जैसे ही उसका लंड ज़ूबी की चूत में घूसा, ज़ूबी को हल्का सा दर्द हुआ। ज़ूबी ने टेबल के किनारे को और कस के पकड़ लिया और अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि ठीक अपने निकाह में बैठने के पहले वो किसी और मर्द से चुदवा रही थी।

राज ने ज़ूबी के शरीर को काँपते हुए देखा। उसकी सूखी चूत शायद उसके मूसल लंड के लिये तैयार नहीं थी। राज ने भी कोई जोर नहीं लगाया, वो आराम और धीरे से अपने लंड को उसकी चूत में घुसाने लगा। वो तो ज़ूबी को सिर्फ़ ये बताना और ये एहसास दिलाना चाहता था कि वो जब और जहाँ चाहे ज़ूबी को चोद सकता है। वो ये बताना चाहता था कि ज़ूबी की शादी के बाद भी हालात यही रहने वाले हैं और बदलेंगे नहीं।

राज ने ज़ूबी के चूत्तड़ों को कस कर पकड़ा और अपने लंड को अंदर तक घुसा दिया। ज़ूबी की चूत गीली हो जाये इसलिये उसने अपने लंड को अंदर तक घुसा कर वहीं थोड़ी देर तक रहने दिया। फिर उसने थोड़ा सा बाहर खींचा और फिर हल्के से अंदर पेल दिया। जब उसने देखा कि ज़ूबी का मुँह खुला है और वो गहरी साँसें ले रही है तो वो समझ गया कि लौंडिया को भी मज़ा आ रहा है।

थोड़ी ही देर में ज़ूबी की चूत गीली हो गयी और अब राज का लंड बड़ी आसानी से अंदर बाहर हो रहा था। राज ने देखा कि ज़ूबी ने अपने शरीर को पत्थर सा कर लिया जिससे वो ये अंदाज़ा ना लगा सके कि वो भी बड़े आनंद से चुदाई का मज़ ले रही है। राज इस बात की परवाह ना करते हुए उसकी चूत में जोरों से लंड को अंदर बाहर कर रहा था। राज ने जानबूझ कर कई दिनों से किसी को चोदा नहीं था, जिससे वो ज्यादा से ज्यादा पानी ज़ूबी की चूत में छोड़ सके।

किसी लड़की को उसकी शादी से चंद मिनट पहले वो चोद रहा है, इस ख्याल ने राज के शरीर में और उत्तेजना भर दी। ये लड़की अब उसकी गुलाम है, वो जब चाहे और जैसे चाहे उसे इस्तमाल कर सकता है, और थोड़ी देर में ही वो उसकी चूत को अपने पानी से भरने वाला है।

वहीं ज़ूबी शरम के मारे मरी जा रही थी पर चुदाई एक ऐसी चीज़ है कि इंसान चाह कर भी अपनी उत्तेजना को छुपा नहीं सकता है। जैसे ही ज़ूबी को ये एहसास हुआ कि उसकी चूत भी पानी छोड़ने वाली है, उसके कुल्हे अपने आप ही पीछे की ओर हुए और राज के लंड को अपनी चूत के अंदर तक ले लिया।

ज़ूबी के कुल्हों को अपने शरीर से सटते देख राज और जोरों से धक्के लगाने लगा। ज़ूबी अब उसके धक्कों का साथ दे रही थी। ज़ूबी को लगा कि अब उससे सहन नहीं होने वाला है तो उसने अपना हाथ अपनी टाँगों के बीच किया और राज के अंडकोशों को पकड़ कर मसलने लगी। थोड़ी ही देर में राज के लंड ने उसकी चूत में पानी छोड़ दिया।

ज़ूबी उसकी गोलियों को मसलते हुए उससे उसका पानी निचोड़ रही थी, कि अचानक उसका शरीर काँपा। उसने अपने होंठों को दाँतों से दबा लिया जिससे उसकी उत्तेजना की चींख बाहर ना सुनायी दे सके। उसकी चूत ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया।

राज भी ज़ूबी के कुल्हों को पकड़ कर अपना पानी उसकी चूत में छोड़ने लगा। जब उसने देखा कि उसके अंडकोश खाली हो गये हैं और एक-एक बून्द ज़ूबी की चूत में गिर पड़ी है तो उसने अपने लंड को ज़ूबी की चूत से बाहर निकाल लिया।

ज़ूबी ने अपनी साँसों पर काबू पाया और देखा कि जूली राज के लंड को अपने मुँह में ले कर चूस रही है। थोड़ी देर बाद जूली ने उसके लंड को अपने मुँह से निकाला और उसे राज के अंडरवीयर में रख कर उसकी पैंट को ऊपर खींच दिया। फिर जूली उठी और ज़ूबी को कपड़े दुरुस्त करने में मदद करने लगी। फिर राज ने जाकर कमरे का दरवाजा खोल दिया। ये सब इतनी जल्दी से हुआ कि ज़ूबी को मौका ही नहीं मिला कि वो अपनी पैंटी राज से माँग सकती।

जैसे ही उसके परिवार वाले और उसके मेहमान कमरे में आये, राज ने बड़ी विनम्रता से उनसे बात की और जूली को अपने साथ ले कर वहाँ से चला गया। ज़ूबी बड़ी डरी और सहमी हुई सी कमरे के बीचों बीच खड़ी थी, उसे डर था कि कहीं किसी को उस पर कोई शक ना हो जाये। जब निकाह का वक्त हो गया तो उसकी सहेलियाँ उसे लेकर नीचे आ गयीं।

ज़ूबी अपनी सहेलियों का हाथ पकड़े निकाह वाले हॉल की ओर आ रही थी। कमरा मेहमानों से भरा पड़ा था और सभी ज़ूबी को देख मुस्कुरा रहे थे। मिस्टर राज और जूली पास ही खड़े थे। वो राज से नज़रें बचाते हुए दूसरे मेहमानों की ओर देख मुस्कुरा रही थी, कि तभी उसने महसूस किया कि राज का वीर्य उसकी चूत से बहकर उसकी जाँघों के अंदरूनी हिस्से को और उसकी टाँगों को गीला कर रहा है।

* * * * * * * *

ज़ूबी कि शादी को कई हफ़्ते बीत चुके थे। आज भी उसे वो दिन याद था कि शादी के तुरंत बाद कैसे बड़ी मुश्किल से उसने अपने आपको साफ़ किया था जिससे उसके शौहर को उस पर शक ना हो पाये। जैसे-जैसे समय बीतता गया, वो अपने साथ हुए हादसों को भूलने लगी।

वो खुशकिस्मत थी कि उसी इज्जत के साथ उसे आज भी अपनी नौकरी हासिल थी। किन हादसों से गुज़र कर उसने अपनी नौकरी बचायी थी। गलती उसकी ही थी शायद, एक तो इतने बड़े ग्राहक का केस उसने गलत तरीके से संभाला था, दूसरा अगर उसकी गलती सामने आ जाती तो शायद उसे अपने वकील के लायसेंस से भी हाथ धाना पड़ सकता था। पर उसकी मेहनत और लगन ने उसे इन सबसे बचा लिया था।

एक अंजान सा डर अब भी ज़ूबी के जेहन में आता रहता था। उसे पता था कि एक ना एक दिन मिस्टर राज जरूर उसे याद करेगा और हो सकता है कि शर्मिन्दगी और जिल्लत का वही दौर फिर से शुरू हो जाये। उसने कई कोशिश कि वो राज के चुंगल के निकल जाये, पर जब तक राज के पास उसकी चुदाई का वीडियो कैसेट था वो कुछ नहीं कर सकती थी।

गुजरते वक्त के साथ उसे लगने लगा कि राज उसकी ज़िंदगी से निकल गया है, पर अल्लाह अभी कहाँ उसपर मेहरबान हुआ था।

एक दिन सुबह वो अपनी कंपनी के पार्टनर के साथ उसके केबिन में किसी केस पर बहस कर रही थी कि तभी इंटरकॉम पर रिसेप्शनिस्ट की आवाज़ आयी।

“ज़ूबी, मिस्टर राज लाइन नंबर सात पर तुमसे बात करना चाहेंगे” रिसेप्शनिस्ट की आवाज़ सुनायी दी।

रिसेप्शनिस्ट की आवाज़ सुनकर उसके हाथ में पकड़ा कॉफी का मग हिलने लगा। उसका बदन फिर एक डर से काँप उठा। फाइल जो उसकी गोद में पड़ी थी फ़िसल कर ज़मीन पर गिर पड़ी।

“ज़ूबी तुम ठीक तो हो ना पार्टनर ने पूछा। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

ज़ूबी ने अपनी गर्दन धीरे से हिलायी और लगभग लड़खड़ाती आवाज़ में जवाब दिया, “मिस्टर प्रशाँत! एक जरूरी फोन है जिसे मुझे लेना पड़ेगा, मैं अभी आयी।”

बिना कुछ और कहे ज़ूबी कुर्सी से उठी और काँपते हाथों से कॉफी के मग को पार्टनर की टेबल पर रखा और लगभग दौड़ती हुई अपने केबिन में पहुँची।

मिस्टर प्रशाँत, एक चालीस साल का आदमी था। वो हैरानी से ज़ूबी को अपने केबिन से जाते हुए देखता रहा। जैसे ही वो केबिन के बाहर निकली, उसने उठकर अपने केबिन का दरवाजा बंद किया और अपनी अलमारी से एक छोटा सा टेप रिकॉर्डर निकाल कर फोन से अटैच कर दिया। फिर वो लाइन सात के कनेक्ट होने का इंतज़ार करने लगा। उसने फोन का स्पीकर ऑन कर दिया और ज़ूबी और मिस्टर राज की बातें सुनने लगा।

वो सोच रहा था कि कंपनी के सबसे बड़े ग्राहक के साथ ज़ूबी अकेले में क्या बात करना चाहती है। कहीं दोनों के बीच कोई खिचड़ी तो नहीं पक रही।

“हेलो! हाँ मैं ज़ूबी बोल रही हूँ।”

“हाय, ज़ूबी! राज बोल रहा हूँ। कैसी हो मेरी काबिल वकील राज ने पूछा।

“मैं ठीक हूँ ज़ूबी किसी भी निजी विषय पर उससे बात नहीं करना चाहती थी, “क्या आप अपनी फाइल के बारे में बात करना चाहते हैं

“वैसे तो मैं अपनी फाइल के बारे में भी जानना चाहता हूँ, पर मुझे ये कहते हुए अफ़सोस हो रहा है कि तुम भूल गयी हो कि मैं कौन हूँ।”

“ऐसे कैसे भूल सकती हूँ आपको ज़ूबी जबर्दस्ती हंसते हुए बोली, “मैं आपके नये केस के सिलसिले में आपसे बात करने ही वाली थी।”

“हाँ... हाँ... मेरी बात धयान से सुनो, तुम्हें मेरा एक काम करना होगा” राज ने कहा।

राज की बात सुनकर ज़ूबी का दिल बैठ गया, “क्या चाहते हैं आप मुझसे

“दिल्ली में मेरी एक दोस्त है, जिसे उसके बिज़नेस में कुछ मदद चाहिये” राज ने जवाब दिया, “मैं चाहता हूँ कि गुरुवार को तुम दिल्ली जाकर उससे मेरे ऑफिस में मिलो। तुम रविवार की शाम तक रुकने के हिसाब से अपना प्रोग्राम बनाना।”

ज़ूबी की समझ में नहीं आया कि वो क्या जवाब दे, “क्या ऑफिस से और वकील भी मेरे साथ जायेंगे ज़ूबी ने पूछा।

“नहीं मैं चाहता हूँ कि तुम अकेली वहाँ जाओ” राज ने जवाब दिया।

“क्या मैं अपने शौहर को अपने साथ ला सकती हूँ

“हाँ जरूर ला सकती हो राज ने कहा और जोरों से हंसने लगा, “मुझे विश्वास है कि वहाँ पर तुम अपनी चुदाई अपने शौहर को दिखाना नहीं चाहोगी। मैं तो वो सीडी भी तुम्हारे शौहर को दिखा सकता हूँ जिसमें मैं तुम्हारी चुदाई कर रहा हूँ, और उसे वो भी बताना चाहुँगा कि किस तरह होटल के कमरे में तुमने कितने मर्दों के साथ एक साथ चुदवाया था।”

ज़ूबी खामोशी से सहमी हुई राज की बातें सुनती रही।

तभी राज ने आगे कहा, “क्या मैं तुम्हारे शौहर को उस होटल के रूम सर्विस वाले नौजवान के बारे में भी बताऊँ कि किस तरह उसने तुम्हारी चुदाई की थी।”

फोन पर थोड़ी देर खामोशी छायी रही। तभी ज़ूबी ने जल्दी से कहा, “नहीं... नहीं... मेरे शौहर को इस सब में मत घसीटो, ये तुम्हारे और मेरे बीच की बात है... इसे हम दोनों तक ही सिमित रहने दो।”

“ठीक है तो फिर अपने जाने की तैयारी करो और वहाँ पर रविवार की शाम तक का प्रोग्राम बना लो राज ने कहा। फिर राज ने उसे उस औरत का फोन नंबर दिया जिससे उसे दिल्ली में सम्पर्क करना था और कहना था, “मैं आपका वो इनाम हूँ जिसे मिस्टर राज ने आपको देने को कहा था।” राज फिर हंसा, “समझ गयी ना।”

“हाँ मैं समझ गयी, वैसे ही होगा जैसा आप चाहेंगे कहकर ज़ूबी ने फोन रख दिया।

उधर मिस्टर प्रशाँत ने भी फोन रख दिया और टेप रिकॉर्डर को ऑफ कर दिया। उसने वो फोन नंबर भी लिख लिया था जो राज ने ज़ूबी को दिया था। वो उठा और उसने दरवाजे की कुंडी खोल दी और वापस आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया।

वो राज और ज़ूबी की बातें सुनकर हैरान था। उसे ये शक तो था कि ऑफिस में कहीं गड़बड़ जरूर है। उसे ये भी शक था ऑफिस में काम करने वाली लड़कियाँ क्लायंट्स का बिस्तर गरम करती हैं, पर ज़ूबी... उसके लिये तो वो ऐसा सोच भी नहीं सकता था। ज़ूबी इतनी मेहनती और अच्छे चाल चलन वाली लड़की थी।

प्रशाँत ने फोन उठाया और दिल्ली का वो नंबर मिलाया जो राज ने ज़ूबी को दिया था। दूसरी तरफ़ एक औरत ने फोन उठाया।

“मैं आपकी क्या मदद कर सकती हूँ एक मादक और सैक्सी आवाज़ ने पूछा।

प्रशाँत ने नंबर तो मिला लिया था पर उसकी समझ में नहीं आया कि वो क्या कहे, उसने खंखारते हुए कहा, “मुझे ये नंबर किसी ने दिया था।”

“क्या आप दिल्ली में है जनाब।”

“नहीं फ़िलहाल तो नहीं! पर इस शनिवार को मैं दिल्ली पहुँच रहा हूँप्रशाँत ने जवाब दिया।

“क्या आपको एक जवान लड़की की जरूरत है उस मादक आवाज़ ने पूछा।

अब उसकी समझ में आया कि ये नंबर किसी वेश्यालय का है या फिर ऐसी सर्विस सैंटर का है जो लड़कियाँ सपलायी करती है। “हाँ मैं भी कुछ ऐसा ही सोच रहा था” उसने जवाब दिया।

“हमारे यहाँ बहुत ही खूबसूरत और जवान लड़कियाँ उपलब्ध हैं। जब आप शहर में आ जायें तो इस नंबर पर सम्पर्क कर के अपनी जरूरत बता दें, ठीक है।”

“जरूर कहकर प्रशाँत ने फोन रख दिया।

तभी ज़ूबी ने केबिन के दरवाजे पर दस्तक दी, “क्या मैं अंदर आ सकती हूँ

प्रशाँत ने उसे अंदर आने का इशारा किया और गौर से उसे देखने लगा। ज़ूबी ने एक सिल्क का ब्लाऊज़ पहना था जो गले के नीचे तक खुला हुआ था। प्रशाँत ने देखा कि ज़ूबी ने एक टाइट स्कर्ट पहन रखी थी जिससे उसके चूत्तड़ों की गोलाइयाँ साफ़ दिखायी दे रही थी और पैरों में काफी हाई हील के सैंडल पहने हुए थे जिनसे उसकी चाल और भी सैक्सी लग रही थी। ज़ूबी उसके सामने कुर्सी पर बैठ गयी जिससे उसकी जाँघों के अंदरूनी हिस्से दिख रहे थे। ये सब देख कर प्रशाँत का लंड पैंट में खड़ा होने लगा।

प्रशाँत को मन ही मन गुस्सा आ रहा था। उसे आज से कई साल पहले का वो किस्सा याद आ गया जब वो ऑफिस में नये और काबिल वकीलों को भर्ती कर रहा था। इस काम में इंटरवियू, गैदरिंग और पिकनिक शामिल थी। उसे याद आ रहा था कि उस दिन ज़ूबी कितनी सुंदर दिख रही थी शॉर्ट स्कर्ट और टॉप में। उस दिन शाम को पार्टी में वो कुछ ज्यादा ही पी गया था और भूल से उसने ज़ूबी को बांहों में भर कर चूमना चाहा था, पर किस कदर ज़ूबी ने उसकी बेइज्जती की थी और ये बात उसके पार्टनरों और बीवी तक को बताने की धमकी दी थी। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

कई बार माफी माँगने के बाद वो ज़ूबी को समझा पाया था। इस बात का ज़िक्र ज़ूबी ने फिर कभी किसी से नहीं किया था। पर प्रशाँत ने ज़ूबी को माफ़ नहीं किया था, कि किस कदर उसने उसे धमकाया था। शायद बदले का समय आ गया था।

प्रशाँत के ख्यालों से बेखबर ज़ूबी अपनी ही सोच में खोयी हुई थी। “कहो ज़ूबी क्या काम है प्रशाँत ने पूछा।

“ओह सर! मुझे गुरुवार को किसी काम से दिल्ली जाना है” ज़ूबी ने चौंकते हुए कहा।

“ठीक है तुम जा सकती हो” प्रशाँत ने उसे जाने की इजाज़त दे दी।

ज़ूबी बड़ी दुविधा में अपना सफ़र का बैग पैक कर रही थी। उसे अपने आप से घृणा हो रही थी। उसे अपनी शौहर से झूठ बोलना पड़ रहा था और साथ ही बेवफ़ायी भी करनी पड़ रही थी। पर शायद ये वक्त का फ़ैसला था जिसे वो मानने पर मजबूर थी। उसकी ज़िंदगी अब उसकी नहीं थी, उसके हाथों से फ़िसल कर किसी और की हो चुकी थी।

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शुक्रवार की सुबह ज़ूबी दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल के बिस्तर पर लेटी थी। बिस्तर की चादर और कंबल उसके नंगे बदन से फ़िसल कर उसके पैरों के पास पड़े थे। उसकी नंगी चूचियाँ तन कर खड़ी थी। वो बिस्तर पर लेटी हुई सामने राज को देख रही थी।

राज कमरे में लगे आइने में देख कर अपने कपड़े पहन रहा था। ज़ूबी अब भी अपनी चूत को राज के वीर्य से भरा हुआ महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था कि पानी उसकी चूत से बह कर बिस्तर पर गिर पड़ेगा।

जैसी उम्मीद थी, कल शाम से आज सुबह तक राज ने कई बार उसके शरीर को रौंद कर अपनी वासना को शांत किया था। बावजूद इसके कि वो राज से नफ़रत करती थी और उसका इस तरह उसे चोदना अच्छा नहीं लगता था पर जब भी राज का मूसल लंड उसकी चूत में घूसता तो वो अपनी उत्तेजना को नहीं रोक पाती थी। ना चाहते हुए भी उसकी कमर अपने आप राज के धक्कों का साथ देने लगती और उसका मन करता कि राज इसी तरह उसकी चूत को चोदता रहे। ना चाहते हुए भी उसकी चूत ने कितनी बार पानी छोड़ा होगा उसे याद नहीं।

राज ज़ूबी के पास आया और उसका हाथ पकड़ लिया, “तुम थोड़ा आराम करो उसने कहा, “उसके बाद मैंने जैसे तुम्हें समझाया है, वैसा ही करना, समझ गयी ना।”

ज़ूबी ने खामोश रहते हुए अपनी गर्दन हिला दी। उसे पता था कि इन हालातों में प्रश्न करना या विरोध करना मुनासिब नहीं है।

राज के जाने के थोड़ी देर बद वो फोन पर उस नंबर को मिलाने लगी जो राज ने उसे दिया था। वो सोच रही थी कि पता नहीं तकदीर ने उसके लिए भविष्य में क्या-क्या बचा कर रखा है। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

फोन मिलते ही एक औरत ने जवाब दिया और ज़ूबी ने उसे अपना परिचय दिया।

“ओहहह... हाँ उसने मुझसे कहा था कि तुम जरूर फोन करोगी, दिल्ली में तुम्हारा स्वागत है” उस औरत ने कहा।

उस औरत का दोस्ती और प्यार भरा अंदाज़ पाकर ज़ूबी को थोड़ी राहत सी हुई। ज़ूबी पहले तो हिचकिचायी और फिर धीरे से बोली, “मुझे नहीं पता कि मैं आपको क्यों फोन कर रही हूँ।”

“उसके लिये तुम्हें मेरे ऑफिस में आना पड़ेगा जहाँ हम बात कर सकेंगे उस औरत ने जवाब दिया। फिर उसने ज़ूबी को एक पता लिखाया और दो घंटे में वहाँ पहुँचने के लिए कहा, “याद रखना सुबह के साढ़े दस तक पहुँच जाना।”

“ठीक है मैं पहुँच जाऊँगी कहकर ज़ूबी ना फोन रख दिया।

ज़ूबी तुरंत बिस्तर से उठी और नहाने के लिए बाथरूम में घुस गयी। शॉवर के नीचे खड़ी वो बाथरूम में लगे आइने में अपने बदन को देखने लगी। वो अपने कसे हुए बदन को देख रही थी और उसे पता था कि सारे मर्द उसके इस तराशे हुए बदन पर मरते हैं। उसने घंटों जिम में मेहनत कर के अपने बदन को कसा हुआ रखा था।

नहाते वक्त जब वो अपने निप्पल पर और चूत पर साबून लगाती तो एक अनजानी सी सनसनी शरीर में दौड़ जाती। वो जानती थी कि उसे फँसाया गया है और आने वाले कुछ दिनो में वसना के बहके मर्द उसके शरीर को इस्तमाल करने वाले है।

ज़ूबी ने उस बंगले के दरवाजे की घंटी बजायी। थोड़ी देर बाहर खड़े रहने के बाद दरवाजा खुला और उसने बंगले के अंदर कदम रखा। कमरे के अंदर कई सोफ़े पड़े थे और ढेर सारी कुर्सियाँ भी थी। एक कोने में टी.वी चल रहा था। कमरे में कोई नहीं था सिवाय उस औरत के जिसने दरवाजा खोला था। उसने ड्राइंग रूम के साथ बने ऑफिस में उसे पहुँचा दिया।

“हमारा काम आधे घंटे में शुरू होगा उस औरत ने कहा, “तुम अपने साथ कुछ कपड़े लायी हो बदलने के लिए।”

“नहींज़ूबी ने जवाब दिया, “मुझे पता नहीं था कि कपड़े भी साथ लाने हैं।”

“वैसे तो तुम्हें कपड़ों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी वो औरत हंसते हुए बोली, “तुम हो ही इतनी सुंदर कि तुमने क्या पहन रखा है इससे कोई फ़रक नहीं पड़ता।”

“पर मुझे यहाँ करना क्या होगा ज़ूबी ने थोड़ा सहमते हुए पूछा।

“यहाँ पर मर्द लोग आते हैं, और मेरी लड़कियों में से किसी को चुनते हैं... वो लड़की फिर उसका दिल बहलाती है...” उस औरत ने जवाब दिया।

“दिल बहलाती है ज़ूबी ने चौंकते हुए कहा।

“मिस्टर राज ने झूठ नहीं कहा था कि तुम बेवकूफ़ हो... अरे यार वो लड़की उस मर्द को एक कमरे में ले जाती है और फिर उससे चुदाई करवा कर उसका दिल बहलाती है।”

उस औरत की ये बात सुन कर ज़ूबी का दिल बैठ गया। राज ने उसे पूरी तरह रंडी बनाने कि ठान ली थी। क्या वो ये सब कर पायेगी। क्या उसके पास इन सब से बचने के लिए कोई रास्ता है। “तुम ये कहना चाहती हो कि मैं यहाँ रंडी बन जाऊँ ज़ूबी ने उस औरत से पूछा।

“क्या तुमने इसके पहले ये सब नहीं किया है

ज़ूबी देर तक उसकी आँखों में झाँकती रही और फिर अपनी गर्दन ना में हिला दी।

“देखो उस औरत ने कहा, “तुम्हारा शरीर इतना सुंदर है कि कोई भी मर्द तुम्हें नापसंद नहीं कर सकता। तुम्हारे इस सुंदर चेहरे और कसावदार बदन को देख कर मुझे लगता है कि तुममें रंडी बनने के सब गुण हैं।”

“पर एक रंडी ज़ूबी ने कहा, “लोग क्या कहेंगे!” इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

“किसी को पता नहीं चलेगा, डरो मत।”

उस औरत का अनुभव इतना था कि उसे पता था कि उसे ये नहीं पूछना था कि ज़ूबी तुम ये करोगी कि नहीं, बल्कि उसने उससे ये कहा कि वो सब संभाल लेगी, पैसों की वो चिंता ना करे उसे बस आने वाले मर्दों को सिर्फ़ खुश करना है। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

“अब जब तुम पहनने के लिये कुछ लायी नहीं हो, तो ऐसा करो उस कमरे में चली जाओ और अपने कपड़े उतार दो, सिर्फ़ ब्रा और पैंटी पहने रहना और हाँ अपनी ऊँची ऐड़ी की सैंडल भी मत उतारना” उस औरत ने एक कमरे की और इशारा करते हुए कहा।

ज़ूबी जैसे ही मरे हुए कदमों से उस कमरे की तरफ़ बढ़ी उसे फोन कि घंटी सुनायी दी और फिर उस औरत को बात करते सुना।

“हेलो उस औरत की खुशी से भरी आवाज़ सुनायी दी, “हाँ, राकेश तुम आ सकते हो। ओह... हाँ एक नयी चिड़िया आयी है... तुम्हें पसंद आयेगी। बहुत ही सुंदर, जवान और मस्त है। हाँ...! हाँ... मेरे राजा! जल्दी आओ... अरे किसी और को दिखाऊँगी भी नहीं... जल्दी आना। हाँ आज उसका पहला दिन है।”

ज़ूबी की साँसें तेज हो गयी थीं, उसका दिल घबरा रहा था और अंगुलियाँ ब्लाऊज़ के बटन खोलते हुए काँप रही थी। बड़ी मुश्किल से उसने अपने कपड़े उतारे और फिर धीरे से दरवाजा खोल कर झाँकने लगी।

उस औरत ने उसे बाहर आने को कहा। ज़ूबी बहुत ही अपमानित और शर्मिंदगी महसूस कर रही थी। तकदीर भी अजीब खेल खेल रही थी उसके साथ। कहाँ एक स्वाभिमानी वकील, अच्छे संसकारों में पली बड़ी वो आज अपने बदन का सौदा करने पर मजबूर थी।


अध्याय-४


जूबी उस औरत के सामने सिर्फ़ ब्रा, पैंटी और हाई हील के सैंडल पहने खड़ी थी। वो औरत ज़ूबी के तराशे हुए बदन को ध्यान सा देख रही थी। ज़ूबी का संगमरमर सा तराशा बदन और उस पर हल्के गुलाबी रंग की ब्रा और पैंटी - वो सही में बहुत सुंदर दिख रही थी।

ज़ूबी के बदन को निहारते हुए उस औरत के मुँह से हल्की सी सीटी बज गयी, “वाह, मज़ा आ गया तुम्हारे इस मखमली बदन को देख कर, लगता है कि यहाँ आने वालों पर तुम बिजली गिरा के रहोगी, थोड़ा सा घूम जाओ मेरे लिये।”

उस औरत से अपनी प्रशंसा सुनकर ज़ूबी का चेहरा सुर्ख हो गया। उस छोटी सी ब्रा से उसके भारी मम्मे तो साफ़ दिखायी दे रहे थे पर वो शरमा इसलिए गयी कि उसने बहुत ही छोटी पैंटी पहनी थी और घूमने से उसके चूतड़ साफ़ नंगे दिखायी देते।

उस औरत ने एक बर उसके बदन की तारीफ की और उसे दूसरे कमरे में जाने का इशारा किया।

ज़ूबी आहिस्ता-आहिस्ता चलती हुई बगल के कमरे में पहुँची। वहाँ और तीन जवान और सुंदर लड़कियाँ पहले से थी। ज़ूबी ने देखा कि वो तीनों भी काफी सुंदर और जवान थी और उन्होंने भी उसी की तरह सिर्फ़ ब्रा पैंटी और हाई हील के सैंडल पहन रखे थे।

उस औरत ने ज़ूबी का परिचय तीनों लड़कियों से कराया। ज़ूबी शरम के मारे अपनी आँखें ज़मीन पर गड़ाये हुए थी। उसे अपने इस नंगे बदन पर शरम सी आ रही थी और वो अपने आप को कोस रही थी कि आज सुबह उसने ये छोटी वाली ब्रा और पैंटी क्यों पहनी।

उन तीनों लड़कियों ने ज़ूबी का नयी जगह पर उसका स्वागत किया। तभी मेन दरवाजे की घंटी बज पड़ी। उस घंटी को सुन कर वो औरत दरवाज़ा खोलने के लिये दौड़ पड़ी। जब वो वापस आयी तो तीनों लड़कियाँ खड़ी हो गयी। ज़ूबी भी उनकी देखा देख खड़ी हो गयी पर अपनी नज़रें उस आने वाले मर्द से चुराती रही। ज़ूबी ने अपनी जाँघों को अपनी हथेलियों से ढक लिया।

“ओह राकेश लगता है तुमसे थोड़ा भी इंतज़ार नहीं किया गया, जो ऑफिस से दौड़ते चले आ रहे हो उस औरत ने आने वाले मर्द को चिढ़ाते हुए कहा। राकेश करीब ४५ साल का था और उसके सिर के बाल लगभग उड़ चुके थे। वो अपने माथे पे आये पसीने को अपने रुमाल से पौंछ रहा था और साथ ही चारों लड़कियों को ध्यान से देख रहा था।

एक लड़की ने अपना परिचय दिया, बाकी दो ने “हाय राकेश” कहकर उसका अभिवादन किया। जब ज़ूबी की बारी आयी तो वो थोड़ा हिचकिचा गयी, “मेरा नाम ज़ू।”

तभी एक लड़की जो शायद ज्यादा अनुभवी थी तुरंत बोल पड़ी, “ये सिमरन है।” ज़ूबी हैरानी से उस लड़की को देखने लगी तो देखा वो मुस्कुरा रही थी। उसने ज़ूबी को अपना असली नाम इस्तमाल करने से बचा लिया था। ज़ूबी बदले में उसकी तरफ़ देख कर मुस्कुरा दी।

पर इसके बाद जो हुआ ज़ूबी उसके लिये तैयार नहीं थी।

उस आदमी ने अपनी जेब से अपना पर्स निकाला और उस औरत की और देखते हुए कहा, “मैं सिमरन से मिलना चाहुँगा, सिर्फ़ आधे घंटे के लिये।” ज़ूबी हैरानी से उस मर्द को देख रही थी जो अपने पर्स से नोट निकाल कर गिन रहा था। वो सोच रही थी एक लड़की को चोदने के लिये कितने पैसों की ज़रूरत हो सकती है।

वो औरत ज़ूबी और राकेश को लेकर हॉल के बगल के कमरे में लेकर आ गयी। फिर उस औरत ने बिस्तर के बगल में एक कॉंन्डम का पैकेट रख दिया।

“अब तुम दोनों मज़े करो ये कहकर उस औरत ने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और बाहर चली गयी।

“तुम शायद यहाँ पर नयी आयी हो अपने जूते उतारते हुए राकेश ने कहा। फिर उसने अपनी पैंट उतारी और फिर शर्ट भी उतार दी। थोड़ी देर में वो अपनी अंडरवीयर उतार कर नंगा हो गया। राकेश की छाती, पीठ और कंधे बालों से भरे पड़े थे। उसका लंड अभी पूरी तरह खड़ा तो नहीं हुआ था पर मोटा काफी था। ज़ूबी ने देखा कि उसके अंडकोश भी काफी बड़े थे।

“सिमरन क्या मैं अकेला ही नंगा रहुँगा? तुम्हें भी अपनी ब्रा और पैंटी उतारनी होगी।” राकेश ने कहा।

ज़ूबी ने अपने कंधे उचकाये और अपनी ब्रा के हुक खोलने लगी। ब्रा उतरते ही उसके दोनों कबूतर पिंजरे से आज़ाद हो गये। शायद चुदाई के ख्याल से ही उसके निप्पल तन गये थे।

राकेश ज़ूबी की भारी और नुकिली चूचियों को देख रहा था और ज़ूबी ने अपनी पैंटी नीचे खिसकायी और अपने पैरों से उतार कर उसे दूर फेंक दिया। ज़ूबी ने देखा कि राकेश उसकी तराशी हुई चूत को देख रहा है। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

राकेश ने अपनी बांहें फैलायी और ज़ूबी को पास आने का इशारा किया। ज़ूबी धीरे-धीरे चलते हुए उसकी बांहों में समा गयी। ज़ूबी की नुकिली चूचियाँ राकेश की बालों भारी छाती में धंस रही थी। ज़ूबी ने महसूस किया कि उसका लंड उसकी नाभी को छू कर एक सनसनी सी उसके शरीर में पैदा कर रहा है।

राकेश उसे बांहों में भर कर उसके चूतड़ सहलाने लगा। ज़ूबी के शरीर मे भी उत्तेजना फैलने लगी। उसके भी हाथ खुद-ब-खुद उसकी पीठ पर कस गये। उत्तेजना मे ज़ूबी का शरीर काँप रहा था।

राकेश का एक हाथ अब ज़ूबी की जाँघों के अंदरूनी हिस्सों को सहला रहा था। ज़ूबी ने अपनी टाँगें थोड़ी फैला दी जिससे राकेश के हाथ आसानी से उसकी चूत को सहला सकें। तभी राकेश ने उसकी चूत को सहलाते हुए अपनी दो अँगुलियाँ उसकी चूत में घुसा दीं। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

ज़ूबी की चूत अभी गीली नहीं हुई थी, इसलिए राकेश की अँगुलियों से उसे दर्द हो रहा था। राकेश अब अपने दूसरे हाथ से उसकी चूचियों को भींचने लगा। वो एक हाथ से उसकी चूत में अँगुली कर रहा था और दूसरे हाथ से उसके निप्पल भींच रहा था। इस दोहरी हरकत ने तुरंत ही अपना असर दिखाया और ज़ूबी की चूत गीली हो गयी। अब राकेश की अँगुलियाँ आराम से उसकी चूत के अंदर बाहर हो रही थी।

शरीर की उत्तेजना ने एक बर फिर ज़ूबी की अंतरात्मा को धोखा दे दिया। उसके कुल्हे उत्तेजना मे अब आगे पीछे हो रहे थे। ज़ूबी पूरी तरह से राकेश की अँगुलियों की ताल से ताल मिला रही थी। उसके मुँह से हल्की हल्की सिस्करी निकल रही थी, “ओहहहह आआआआहहह।”

राकेश अब और तेजी से अपनी अँगुली ज़ूबी की चूत में अंदर बाहर कर रहा था, “ओहहहह हाँआँआँ ऐसे ही करो ओहहह आआआआआह” ज़ूबी सिसक रही थी।

राकेश ने ज़ूबी का हाथ पकड़ कर अपने खड़े लंड पर रख दिया। ज़ूबी उसके लंड को अपनी हथेली की गिरफ़्त मे लेकर मसलने लगी। राकेश का लंड अब तनने लगा था। ज़ूबी ने महसूस किया कि अब उसका लंड उसकी हथेली में नहीं समा रहा है तो उत्सुक्ता में वो अपनी नज़रें घुमा कर उस मोटे और विशाल लंड को देखने लगी। लंड के सुपाड़े को देखकर तो वो हैरान रह गयी। उसने इतना मोटा और मूसल लंड पहले कभी नहीं देखा था। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

समय बीतता जा रहा था। राकेश ने बिस्तर के पास पड़े कॉंन्डम के पैकेट को उठाया और अपने दाँतों से फाड़ कर ज़ूबी को पकड़ा दिया।

ज़ूबी ने कॉंन्डम को पैकेट से निकाला और राकेश के लंड को पहनाने लगी।

राकेश ने ज़ूबी की चूत से अपनी अँगुली निकाली और उसे घूमा दिया। अब वो पीछे से उसकी चूत में अपना लंड घुसाने लगा। जैसे-जैसे वो अपने लंड का दबाव बढ़ाता, ज़ूबी बिस्तर को पकड़ कर और झुक जाती, साथ ही अपनी टाँगें भी और फैला देती जिससे उसका मूसल लंड आसानी से अंदर घुस सके।

राकेश ने ज़ूबी के भरे हुए चूतड़ पकड़े और उसकी चूत में लंड घुसाने लगा। थोड़ी ही देर में उसका पूरा लंड ज़ूबी की चूत में घुस चुका था। वो उसके कुल्हों को पकड़ कर धक्के मार रहा था।

“हाँ ले लो मरा लंड... ओओहहह हाँ... और थोड़ी टाँगें फैलाओ राकेश अब जोरों से धक्के लगा रहा था।

ज़ूबी की टाँगें और फ़ैल गयी। उसे लगा कि उसकी चूत फटी जा रही है। उसे राकेश के लंड की लंबाई से उतनी परेशानी नहीं हो रही थी जितनी उसके लंड की मोटाई से। उसकी चूत पूरी तरह गीली होने के बावजूद वो हर धक्के पर कराह रही थी।

“ओहहह थोड़ा धीरे करो ओहहह मर गयी आआआआआआहह

“मेरा लंड ले लो जान, ओहहहह हाँ ऐसे ही... पूरा ले लो बड़बड़ाते हुए राकेश धक्के पे धक्का लगा रहा था।

जितना ज़ूबी कराहती, उतनी ही तेजी से राकेश धक्का मारता। ज़ूबी के कराहने में उसे मज़ा आ रहा था और उसका वहशीपन बढ़ता जा रहा था। वो जानवर की तरह ज़ूबी की चूत को रौंद रहा था।

राकेश ने तभी अपना लंड उसकी चूत से बाहर निकाल लिया, और ज़ूबी को पलट कर बिस्तर पर चित्त लिटा दिया। ज़ूबी को थोड़ी देर के लिए राहत महसूस हुई। वो अपनी साँसों पर काबू पाने की कोशिश करने लगी। राकेश अब उसकी जाँघों के बीच आ गया।

ज़ूबी ने अपनी टाँगें पूरी तरह से फैला दी। उसे ऐसा करते हुए शरम सी आ रही थी पर वो जानती थी कि ऐसा करने से राकेश का लंड आसानी सी उसकी चूत में चला जायेगा, और वो दर्द से बच जायेगी। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

जैसे ही राकेश उसके ऊपर आया, ज़ूबी ने अपना हाथ नीचे कर के उसके तने हुए लंड को पकड़ लिया और अपनी चूत के मुँह पर लगा दिया। एक बार जब राकेश का लंड उसकी चूत में पूरा घुस गया तो वो भी अपने कुल्हे उछाल कर उसका साथ देने लगी।

ज़ूबी को भी आनंद आ रहा था। उसने अपनी टाँगें उठा कर उसकी कमर में कस के लपेट लीं और अपने हाथ उसकी पीठ पर कस लिये। अब ज़ोरों से सिसकते हुए वो उसके धक्कों का साथ दे रही थी।

“हाय अल्लाह ज़ूबी ने सोचा, “बाहर सभी को मालूम है कि मैं इस मर्द से चुदवा रही हूँ।”

“ओहहहहह हाँआँआँ! चोदो मुझे... और जोर से... ओहहहहह हाँ... जोर से” ज़ूबी सिसक रही थी। उसकी चूत अब पानी छोड़ने ही वाली ही थी और वो चाहने लगी कि राकेश भी उसके साथ ही झड़े।

“क्या तुम मेरे साथ झड़ सकते हो? ओहहह हाँ... छोड़ दो अपना पानी मेरी चूत में प्लीज़...! हाँ चोदो... और जोर से उसे खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था कि वो ये भी कह सकती है।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, “पाँच मिनट रह गये हैं, जल्दी करो!” एक लड़की की आवाज़ आयी।

राकेश ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। वो ज़ूबी की जाँघें इतनी कस के पकड़ कर धक्के मारने लगा कि ज़ूबी की आँखों में आँसू आ गये। पर चुदाई का आनंद ऐसा था कि उसके लंड की हर चोट उसकी चूत में और उत्तेजना बढ़ा रही थी। तभी उसने महसूस किया कि राकेश का छूटने वाला है।

“अभी नहीं प्लीज़ रुक जाओओह” ज़ूबी चिल्ला पड़ी।

तभी उसे गाढ़े और गरम वीर्य का एहसास अपनी चूत में हुआ। “हाय अल्लाह! इसका तो छूट रहा है और मेरा अभी बाकी है ज़ूबी सोचने लगी।

“नहीं... अभी नहीं” वो चिल्ला पड़ी।

पर उसकी चिल्लाहट का कोई असर राकेश पर नहीं हुआ। वो जोर के धक्के लगा कर अपना वीर्य उसकी चूत में छोड़ रहा था। ज़ूबी की उत्तेजना अपनी चरम सीमा पर थी। अब ज़ूबी खुद नीचे से धक्के लगा कर अपनी उत्तेजना को शाँत करने की कोशिश करने लगी। वो बेशरम की तरह नीचे से धक्के लगा रही थी। आखिर उसकी चूत ने भी पानी छोड़ दिया।इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

राकेश ने अपने लंड को ज़ूबी की चूत से बाहर निकाला और उसके बगल में लेट गया। राकेश उसकी जाँघों को सहला रहा था, “मज़ा आ गया सिमरन कहकर उसने अपने कपड़े पहने और कमरे से बाहर चला गया।

ज़ूबी बिस्तर पर अपनी आँखें फ़ैलाये लेटी हुई थी कि तभी किसी लड़की की आवाज़ उसे सुनायी दी, “सिमरन अब तुम उठ कर खड़ी हो जाओ

ज़ूबी उछल कर बिस्तर से खड़ी हुई और अपनी ब्रा और पैंटी ढूँढने लगी। उसने देखा कि वो इस्तमाल किया हुआ कॉंन्डम बिस्तर पर पड़ा था। वो लड़की जो कमरे में आयी थी, उसने एक साफ़ टॉवल ज़ूबी को पकड़ा दिया। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

ज़ूबी उस टॉवल को अपनी चूती हुई चूत पर रख कर साफ़ करने लगी। फिर उसने वो कॉंन्डम उठाया और कमरे के बाहर बाथरूम की और दौड़ पड़ी।

जैसे ही वो हॉल में आयी कि अचानक एक सूट पहने मर्द से टकरा गयी। वो औरत उस मर्द को किसी दूसरे कमरे में ले जा रही थी।

“सॉरी माफ़ करना ज़ूबी ने कहा।

वो मर्द उसकी हालत देख कर हँस पड़ा, “सॉरी की कोई बात नहीं है, और ये तुम्हारे हाथ में क्या है ज़ूबी के हाथों मे इस्तमाल किया हुआ कॉंडम देख कर वो मर्द हँसते हुए बोला।

“ये एकदम नयी है यहाँ पर उस औरत ने कहा।

ज़ूबी शरमा कर नंगी ही वहाँ से अपनी सैंडल खटखटाती हुई दौड़ पड़ी। उन दोनों के हँसने की आवाज़ उसे सुनायी दे रही थी।

ज़ूबी बाथरूम मे घुसी और सैंडल उतार कर गरम पानी के शॉवर के नीचे खड़ी हो कर अपने शरीर को धोने लगी। फिर सुखे टॉवल से अपने बदन को पौंछ कर वो फिर सैंडल और ब्रा-पैंटी पहन कर हॉल में आकर बैठ गयी। एक और लड़की उसकी बगल में बैठी थी और उसे देख कर मुस्कुरा रही थी।

ज़ूबी अपनी टाँग पे टाँग रख कर बैठी थी कि उसे बगल के कमरे से सिसकने की और मदक आवाज़ें सुनायी दे रही थी। ये वही कमरा था जिसमें थोड़ी देर पहले वो राकेश के साथ थी।

ज़ूबी की आँखें खुली की खुली रह गयी। उसे चुदाई की आवाज़ साफ़ सुनायी दे रही थी। उसे लगा कि कमरे की दीवार जैसे कागज़ की बनी हुई है। वो आश्चर्य से हॉल में अपने साथ बैठी लड़की की और देखने लगी।

“हाय अल्लाह ज़ूबी ने कहा, “क्या तुम लोगों ने भी वो सब सुना जो मेरे और राकेश के बीच हुआ

वो लड़की मुस्कुराने लगी। “वैसे तो राकेश के साथ चुदाई करना हर किसी के बस की बात नहीं हैउसने ज़ूबी से कहा, “तुम्हारी किस्मत अच्छी थी कि आज उसके पास सिर्फ़ आधा घंटा ही था।”

ज़ूबी उस लड़की की बातें सुनकर जोरों से हँसने लगी। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

ज़ूबी ने कईं घंटे वहाँ गुज़ारे। हर घंटे बाद उसका बुलावा आ जाता और वो फिर किसी कमरे में मर्द के साथ चुदाई करती। मर्द अपना वीर्य उसकी चूत में डाल कर चले जाते। उसे अपने इस वेश्यापन पर हैरानी हो रही थी।

ज़ूबी अब समझ गयी थी कि उसका शरीर अब उसका नहीं रहा था, वो तो राज की मल्कियत बन चुका था, या फिर इस वेश्यालय की माल्किन उस औरत का या फिर उस मर्द का जिसकी जेब में चंद रुपये हैं उसका शरीर खरीदने के लिये। वक्त ने उसकी ज़िंदगी को एक नर्क बना के रख दिया था।

ज़ूबी एक ब्रा और पैंटी और हाई हील के सैंडल पहने हॉल में बैठी थी। वो अपनी आने वाली ज़िंदगी के बारे में सोच रही थी। उसने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि उसे चाहे जो करना पड़े वो अपनी ज़िंदगी को किसी के हाथों का खिलौना नहीं बनने देगी। वो अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जियेगी, किसी की कठपुतली बनकर नहीं। काफी मेहनत और लगन से आज वो अपने कैरियर के इस मुकाम तक पहुँची थी और फिर उसी मेहनत से वो अपनी ज़िंदगी को वापस सही राह पर लाकर रहेगी।

ज़ूबी इस मकान की व्यस्तता देखकर हैरान थी। हर उम्र के मर्द अपने शरीर की भूख मिटाने यहाँ आते थे। पर उसे आश्चर्य इस बात का था कि जब भी वो लाइन में खड़ी होती थी हर बर वो ही ग्राहकों द्वारा चुनी जाती थी। दूसरी लड़कियों को मौका तभी लगता था जब वो किसी मर्द के साथ कमरे में होती थी।

एक बार तो वो हैरान रह गयी। हुआ ऐसा कि दो दोस्त उस वेश्यालय में आये। ज़ूबी समेत उस समय हॉल में चार लड़कियाँ थी। जब वो दोनों दोस्त पसंद करने के लिये लड़कियों को देख रहे थे तो एक मर्द ने उसे पसंद किया, “मैं इसके साथ जाना चाहता हूँ कहकर उसने अपना हाथ बढ़ा दिया।

जब ज़ूबी उसका हाथ पकड़ कर कमरे में जा रही थी तो उसने दूसरे मर्द को कहते सुना, “मेरे दोस्त का होने के बाद मैं भी इसी लड़की के साथ जाना चाहुँगा, तब तक मैं इंतज़ार करता हूँ।”

ज़ूबी उसकी बात सुनकर हैरान रह गयी, उसने माल्किन से पूछा, “क्या ये ऐसा कर सकता है

उसके साथ वाला मर्द और वो औरत दोनों ज़ूबी की बात सुनकर हँसने लगे।

“सिमरनउस औरत ने जवाब दिया, “ग्राहक यहाँ पर भगवान की तरह है। वो जो चाहे कर सकता है” वो औरत फिर हँसने लगी।

ज़ूबी उस मर्द का हाथ पकड़ कर दूसरे छोटे से कमरे में चली गयी। उसे पता था कि एक और लंड बाहर उसका इंतज़ार कर रहा है।

* * * * * * *

प्रशाँत दिल्ली के फाइव स्टार होटल में बड़ी दुविधा में चहल कदमी कर रहा था। उसने बड़ा जोखिम भरा कदम उठाया था। अगर किसी को पता चल गया कि वो किसी वेश्या से मिलने यहाँ आया है तो उसका कैरियर बर्बाद हो सकता था।

वो अभी नहाकर बाथरूम से बाहर आया था। इतनी सर्दी में भी उसके माथे पर पसीना आ रहा था। उसे मालूम था कि वो जोखिम उठा रहा है पर वो भी अपने दिल के हाथों मजबूर था।

जबसे वो दिल्ली पहुँचा था उसका लंड घोड़े की तरह तन कर खड़ा था। उसने फोन पर उस मैडम को यकीन दिलाया था कि वो एक पैसे वाला इंसान है। उसने उस औरत को साफ़ बता दिया था कि उसके आने की खबर किसी को नहीं होनी चाहिये थी। उसने अपनी पसंद के बारे में भी बता दिया था। उस मैडम ने उसे भरोसा दिलाया था कि वो उसकी हर जरूरत को पूरा करेगी।

जैसे ही उसकी टैक्सी उस मैडम के बंगले की तरफ़ जा रही थी, प्रशाँत सोच रहा था कि उसे आगे क्या करना है। क्या ज़ूबी उसे यहाँ मिलेगी और वो अपना बदला ले पायेगा। उसने अपनी घड़ी की तरफ़ देखा। बीस मिनट में उसे पता चल जायेगा कि वो अपने मक्सद में कितना कामयब होगा।

* * * * * *

ज़ूबी बिस्तर का किनारा पकड़ कर घोड़ी बनी हुई थी। उसकी टाँगें पूरी तरह फ़ैली हुई थी और उसकी गाँड हवा में ऊपर को उठी हुई थी। एक तगड़ा सा पहाड़ी मर्द पीछे से उसकी चूत में अपना लंड अंदर बाहर कर रहा था।

ज़ूबी ने अपना चेहरा तकिये से टिकाया हुआ था और वो सामने लगे आइने में देख रही थी कि किस तरह वो मर्द उछल-उछल कर उसे चोद रहा था। ज़ूबी सोच रही थी कि कैसे कईं बार उसके शौहर ने उसे इस अवस्था में चोदा था, और हर बार उसे उतना ही मज़ा आता था जब वो अपना वीर्य उसकी चूत मे छोड़ कर उसकी पीठ पर लुढ़क जाता था। उसके शौहर का मोटा और लंबा लंड उसे कितना मज़ा देता था। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

पर आज वो अपनी मर्ज़ी के खिलाफ़ हर उस लंड को अपनी चूत में लेने पर विवश थी, चाहे वो लंड उसे पसंद है या नहीं। पर लंड चाहे जैस भी हो, जब भी कोई उसे इस आसान में चोदता था तो उसके शरीर की उत्तेजना और बढ़ जाती थी। और आज भी वैसा ही हो रहा था -- फिर उसका शरीर उसे धोखा दे रहा था। ना चाहते हुए भी उसका शरीर उस मर्द की ताल से ताल मिला कर चुदाई का आनंद ले रहा था।

* * * * *

प्रशाँत ने आखिरी बार अपने सेल फोन से उस मैडम का नंबर मिलाया, “मैं बस पहुँचने ही वाला हूँ, सब तैयारी वैसे ही है ना जैसे मैंने कहा था।”

“हाँ आप आ जाइये, सब कुछ वैसे ही होगा जैसा आप चाहेंगे” उस औरत ने जवाब दिया।

* * * * *

उस पहाड़ी मर्द ने एक हुँकार मारते हुए अपना वीर्य ज़ूबी की चूत में छोड़ दिया। फिर उसने कपड़े पहने और कमरे से चला गया। ज़ूबी का पानी नहीं छूटा था और वो निराश होते हुए नहाने के लिये बाथरूम मे घुस गयी। नहाने के बाद उसने अपना मेक-अप ठीक किया और अपनी ब्रा और पैंटी पहन ली। वो अपनी हाई हील की सैंडल पहन ही रही थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई और उस औरत ने बाथरूम में कदम रखा।

“सब कुछ ठीक है ना ज़ूबी ने उस औरत से पूछा। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

“हाँ रानी सब ठीक है उस औरत ने जवाब दिया, “तुम कितना अच्छा काम कर रही हो, मुझे नाज़ है तुम पर।”

ज़ूबी जानती थी कि इस औरत से ज्यादा बात करने में कोई फायदा नहीं है। उसने जबर्दस्ती उस औरत को देख कर मुस्कुरा दिया, “थैंक यू उसने जवाब दिया। ज़ूबी सोच रही थी कि आज उसके वेश्या होने की तारीफ हो रही थी, काश ये तारीफ उसके काम के लिये होती।

“मैं मिस्टर राज को बताऊँगी कि तुमने कितना अच्छा काम किया हैउस औरत ने कहा।

“मुझे अच्छा लगेगा अगर आप मिस्टर राज से ये कहेंगी तो ज़ूबी ने जवाब दिया।

“तुम्हें पता है ना कि मिस्टर राज कितने ताकतवर और पहुँच वाले इंसान हैं, पता है ना तुम्हें उस औरत ने कहा।

ज़ूबी ने अपनी गर्दन हाँ में हिला दी।

“और उसी तरह उनके दोस्त भी उस औरत ने आगे कहा, “उनका एक दोस्त यहाँ अभी आने वाला है, और उसके अपने कुछ नियम हैं। हमें उन नियमों का पालन करना है... खास तौर पर तुम्हें, और एक बात... तुम्हारा भविष्य भी इसी बात पर निर्भर करता है।”

* * * * * *

ज़ूबी एक खास कमरे में बिस्तर पर बैठी थी। उसे इस कमरे में चुपचाप इंतज़ार करने को कहा गया था। उसे कईं बार कमरे के बाहर से कदमों की आहट सुनायी देती जो दूसरे कमरे में जाकर बंद हो जाती। थोड़ी ही देर में उसे कुछ कदमों की आहट सुनायी दी जो शायद उसी के कमरे की तरफ आ रही थी।

तभी दरवाज़ा खुला और सबसे पहले उस मैडम ने कमरे में कदम रखा। उसके पीछे एक जवान लड़की ने ब्रा और पैंटी पहने कदम रखा। वो लड़की बड़ी सहानुभूती से ज़ूबी को देखने लगी। वो सोच रही थी कि पता नहीं इस लड़की पे क्या गुज़रेगी।

तभी प्रशाँत ने कमरे में कदम रखा। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

प्रशाँत बड़ी कामुक नज़रों से उस जवान वकील को देख रहा था जो उसके ऑफिस में काम करती थी। जो लड़की हमेशा अपने यौवन को टाइट ब्लाऊज़ और स्कर्ट में छिपा कर रखती थी आज सिर्फ ब्रा पैंटी और सैंडल पहने करीब-करीब नंगी उसके सामने बिस्तर पर बैठी थी।

प्रशाँत एक चुंबकिय आकर्षण की तरह उसके तराशे हुए बदन को देख रहा था। वो चुप चाप बिस्तर पर बैठी थी। हालाँकि उसकी चूत और चूचियाँ छुपी हुई थी फिर भी उसकी मांसल और पतली टाँगें, और तराशा हुआ बदन ठीक वैसा ही दिख रहा था जैसे उसने हमेशा मुठ मारते हुए सपने में देखा था। उसके गुलाबी और पतले होंठ ऐसे लग रहे थे जैसे उनमें शहद भरा हुआ हो। उसका सुंदर चेहरा काफी मादक लग रहा था और उसकी आँखों पर एक सिल्क की पट्टी बंधी थी, ठीक जैसे उसने चाहा था।

“सीमा यहीं रुकेगी, अगर आपको किसी तरह की मदद की जरूरत हो तो ये आपकी सहायता करेगीमैडम ने प्रशाँत से कहा और ज़ूबी की और इशारा करते हुए कहा, “ये सुंदर कन्या आप जैसे चाहेंगे आपकी सेवा करेगी, आपको किसी तरह की शिकायत नहीं होगी... ये मेरा वादा है।”

मैडम की बात सुनकर उसका लंड पैंट के अंदर हुँकार मारने लगा, “जैसे मैं चाहुँगा वैसे सेवा करेगी ये सोच कर वो मुस्कुराने लगा।

ज़ूबी ने तभी दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ सुनी। कमरे में गूँजती कपड़ों की सर्सराहट से उसे लगा कि अब वो अपने कपड़े उतार रहा है।

ज़ूबी ने तभी उस मर्द के हाथों को अपने कंधों पर महसूस किया। फिर वो हाथ कंधों से नीचे उसकी कमर पर आये और फिर उसके हाथ को पकड़ लिया। प्रशाँत ने उसके हाथ को पकड़ कर उसे बिस्तर से नीचे उतारा और खड़ा कर दिया। वो अपने सैंडल पहने हुए पैरों से चलती हुई दो तीन कदम आगे बढ़ कर कमरे के बीच में खड़ी हो गयी। उसे उस मर्द का एहसास तो हो रहा था पर वो कह नहीं सकती थी कि वो कमरे में कहाँ खड़ा था।

प्रशाँत असल में ज़ूबी से दूर हट गया था। वो बिस्तर के सामने पड़ी चमड़े की कुर्सी पर नंगा बैठा अपनी उस नौजवान सहयोगी को देख रहा था। उसका लंड अभी पूरी तरह तना नहीं था, फिर भी उत्तेजना में हुँकार रहा था। उसने सीमा को ज़ूबी की ब्रा उतारने का इशारा किया।

सीमा ने उसकी ब्रा के हुक खोले और फिर ब्रा के स्ट्रैप को उसके कंधों से निकाल कर ब्रा को ज़मीन पर गिर जाने दिया। ज़ूबी ने अपनी ब्रा को अपने पैरों पर गिरते हुए महसूस किया।

प्रशाँत ने अब सीमा को ज़ूबी के निप्पलों से खेलने का इशारा किया। सीमा ने आगे बढ़ कर ज़ूबी की चूचियों को अपने हाथों में ले लिया। वो उसकी चूचियों को अपने हाथों मे तौलने लगी और फिर अपनी अँगुली और अंगूठे से उसके निप्पल को भींचने लगी। तुरंत ही उसके निप्पल तन कर खड़े हो गये।

सीमा जानती थी कि प्रशाँत उसे रुकने को कहने वाला नहीं था, इसलिए अब वो उसकी चूचियों को मसल रही थी और निप्पल को भींच रही थी। ज़ूबी ने अपने हाथ सीमा के कंधों पर रख दिये जिससे उसे खड़े होने मे आसानी हो। सीमा की हर्कतों ने उसकी चूत में खुजली मचा दी थी और उसकी चूत पूरी तरह से गीली हो गयी थी।

सीमा ने पलट कर प्रशाँत की ओर देखा और ज़ूबी की पैंटी की ओर इशारा किया। प्रशाँत ने हाँ में अपनी गर्दन हिला दी।

सीमा ने अपने घुटने थोड़े से मोड़े और अपनी अँगुलियाँ ज़ूबी की पैंटी की इलास्टिक में फँसा दी। प्रशाँत हैरानी भारी नज़रों से सीमा को ज़ूबी की पैंटी उतारते हुए देख रहा था। उसका लंड अब पूरी तरह से तन गया, और लंड की नसें इतनी फूल गयी थी कि उससे सहन नहीं हो रहा था। उसने अपने लंड को अपनी हथेली में लिया और हिलाने लगा। उसे डर था कि कहीं ज़ूबी को छूने से पहले ही कहीं उसका लंड पानी न छोड़ दे।

ज़ूबी आँखों पर पट्टी बाँधे हुए, नंगी उस ठंडे कमरे में सिर्फ हाई हील के सैंडल पहने खड़ी थी, उसके निप्पल उत्तेजना में तने हुए थे और उसकी छोटी और गुलाबी चूत उसकी मर्ज़ी के खिलाफ़ उत्तेजना में छू रही थी।

प्रशाँत ध्यान से उसकी चूत देख रहा था। उसे लगा कि ज़ूबी ने हाल ही में अपनी चूत की बड़े सलीके से वैक्सिंग की थी। उसने देखा कि उसकी चूत अब चुदने के लिये एकदम तैयार थी।

सीमा अब अपनी अँगुलियाँ उसकी चूत पर फ़िराने लगी। जैसे ही सीमा की अँगुलियों ने ज़ूबी की चूत के दाने को छुआ, उसके शरीर में उत्तेजना की एक नयी लहर सी दौड़ गयी। सीमा ने उस दाने को अपनी अँगुलियों में लिया और मसलने लगी। ना चाहते हुए भी ज़ूबी के मुँह से हल्की सी सिस्करी निकल पड़ी, “ओहहहहह आआआआहहहहह और उसके कुल्हे अपने आप ही आगे को हो गये।

सीमा ने अपनी एक अँगुली उसकी चूत के मुहाने पर रखी तो उसने महसूस किया कि ज़ूबी की चूत किस हद तक गीली हो चुकी थी। सीमा ने अपनी अँगुली उसकी चूत के अंदर घुसा दी और अंदर बाहर करने लगी। उसकी इस हर्कत से उसकी चूत से जो आवाज़ निकल रही थी वो कमरे में सभी को उत्तेजित करने के लिये काफी थी।

ज़ूबी उत्तेजना और मस्ती में इस कदर खो गयी थी कि जब सीमा ने उसकी चूत से अँगुली निकाली तो पागल सी हो गयी। उसका मुँह खुला का खुला रह गया था और वो गहरी साँसें ले रही थी। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

सीमा ने अपनी अँगुली बाहर निकाली और उसका हाथ पकड़ कर उसे वहाँ ले गयी जहाँ प्रशाँत कुर्सी पर बैठा था। जब ज़ूबी के घुटनों ने प्रशाँत की टाँगों को छुआ तो उसने महसूस किया कि वो मर्द अब उसके सामने था। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

ज़ूबी शांति से प्रशाँत के सामने खड़ी थी, उसकी साँसें थमी तो नहीं थी फिर भी उसने अपने मुँह को कस कर बंद कर लिया था। तभी उसने एक मोटी अँगुली को अपनी चूत में घुसते हुए महसूस किया। वो अँगुली आराम से उसकी चूत में घुस गयी और उसके बहते रस से भीग गयी।

ज़ूबी को हैरानी हुई कि वो अँगुली जिस तेजी से उसकी चूत के अंदर घुसी थी उतनी ही तेजी से बाहर आ गयी। उसे और हैरानी हुई जब वो अँगुली जबर्दस्ती उसके अध-खुले होठों से उसके मुँह मे घुस गयी। उसका दिमाग हैरान था कि वो उस मर्द की अँगुली पर लगे अपने ही रस का स्वाद ले रही थी।

“इसे चूस कर साफ़ करो सीमा ने उसके कान मे धीरे से कहा।

ज़ूबी ने अपने मुँह में उस अँगुली को कसा और जीभ में फँसा कर चूसने लगी। प्रशाँत ने अपनी अँगुली उसके मुँह से बाहर निकाली और उसे खिंच कर अपनी और झुका लिया। ज़ूबी की चूचियाँ अब उसकी छाती को छू रही थी।

प्रशाँत ने खींच कर उसे अपने सामने इस तरह खड़ा कर लिया कि उसका लंड ज़ूबी के पीठ को छू रहा था। प्रशाँत अब अपना हाथ उसके चूतड़ों पर फिराने लगा। ज़ूबी नहीं जानती थी कि ये मर्द उससे क्या चाहता है, फिर भी उसने अपनी टाँगें थोड़ी फैला दी जिससे उसे आसानी हो।

प्रशाँत ने उसके चूतड़ों को सहलाते हुए अचानक अपनी अँगुली उसकी चूत में घुसा दी। थोड़ी देर अँगुली को अंदर बाहर करने के बाद उसने अपनी अँगुली बाहर निकाली और उसकी गाँड के छेद पर फिराने लगा। ज़ूबी ने महसूस किया कि उसकी चूत से पानी बह कर उसकी चूत के बाहरी हिस्सों के साथ उसकी जाँघों और टाँगों तक बह रहा है।

प्रशाँत अब अपनी गीली अँगुलियों से उसकी गाँड के छेद मे अपनी अँगुली घुसाने की कोशिश करने लगा।

“नहीं वहाँआँआँ नहीं ज़ूबी जोर से चिल्लायी। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

ज़ूबी ने हाथ पैर पटक कर बहुत कोशिश की कि वो उस मर्द को उसकी गाँड में अँगुली डालने से रोक सके, पर वो सफ़ल ना हो सकी। उस मर्द के मजबूत हाथ और साथ में सीमा कि पकड़ ने उसे ऐसा करने नहीं दिया। अचानक उसे अपनी गाँड मे जोरों का दर्द महसूस हुआ। उस मर्द की अँगुली उसकी गाँड में घुस चुकी थी।

ज़ूबी की छटपटाहट और दर्द देख कर प्रशाँत को मज़ा आने लगा था। उसने उसे और परेशान करने के लिये जोर से उसके चूतड़ों पर थप्पड़ मार दिया।

ज़ूबी के चूतड़ों पर पड़ते थप्पड़ की आवाज़ कमरे में गूँज उठी। दर्द के मारे ज़ूबी की आँखों में आँसू आ गये। एक तो गाँड में अँगुली का अंदर बाहर होना और साथ में इतनी जोर के थप्पड़ - उसे बेहताशा दर्द हो रहा था।

ज़ूबी प्रशाँत के थप्पड़ों से बचने के लिये विरोध करती रही और प्रशाँत था कि अब जोरों से उसके चूतड़ों पर थप्पड़ मार रहा था।

“आआआआआवववव ओंओंओंओंओं ज़ूबी सुबक रही थी। उसकी आँखों में आँसू आ गये थे। आज से पहले कभी किसी ने उसे मारना तो दूर की बात है, कभी छुआ तक नहीं था।

सीमा से भी ये देखा नहीं गया और वो बोल पड़ी, “रुक जाओ मत करो ऐसा।”

पर जैसे प्रशाँत के कानों पे उसकी आवाज़ का कोई असर नहीं हुआ।

“अपनी टाँगें थोड़ी फ़ैलाओ प्रशाँत ने ज़ूबी से कहा।

ज़ूबी की समझ में आ गया कि विरोध करना बेकार था, ये मर्द कुछ सुनने या मानने वाला नहीं था। उसने अपनी टाँगें थोड़ी सी फैला दी।

ज़ूबी का सिर शरम से झुक गया था कि सीमा के सामने वो मर्द उसे नंगा निहार रहा रहा है। अचानक प्रशाँत की अंगुलियाँ उसकी चूत के मुहाने पर चलने लगी तो ज़ूबी सिसक पड़ी। उसकी मोटी अँगुली उसकी चूत में घुस रही थी, और उसके शरीर में कामुक्ता की एक लहर सी दौड़ रही थी। ज़ूबी ने बहुत कोशिश की कि वो स्थिर खड़ी रहे पर उसने उत्तेजना में खुद-ब-खुद टाँगें इस कदर फैला दी कि उस मर्द की अँगुली आसानी से उसकी चूत के अंदर बाहर होने लगी।

तभी ज़ूबी ने महसूस किया कि वो मर्द अब दो अँगुलियाँ उसकी चूत के अंदर डाल कर चोद रहा है। प्रशाँत ने अपनी अँगुलियाँ अच्छी तरह से उसकी चूत के पानी से गीली कर ली और अब उसकी गाँड के छेद पे फ़िराने लगा।

ज़ूबी ने इस बर कोई विरोध नहीं किया और उसकी अँगुली उसकी कसी हुई गाँड मे घुस गयी।

“ओहहहहह आआआहहहह” ज़ूबी सिसक पड़ी।

थोड़ी देर उसकी गाँड मे अँगुली करने के बाद उसने अपनी अँगुली बाहर निकाल ली। उसने सीमा को ज़ूबी की दोनों बांहें कस के पकड़ने का इशारा किया और खुद ज़ूबी के पीछे आकर खड़ा हो गया। उसका लंड मूसल खूँटे कि तरह तन कर खड़ा था।

ज़ूबी कुर्सी पर इस तरह थी कि उसके घुटने तो कुर्सी पर थे और दोनों बांहें हथे पर। सीमा ने उसकी दोनों बांहें कस कर पकड़ रखी थी। ज़ूबी ने महसूस किया कि वो मर्द अब उसके पीछे खड़ा होकर अपना खूँटे जैसा लंड उसकी गाँड के छेद पर घिस रहा है।

प्रशाँत ज़ूबी को कुर्सी पर झुका हुआ देख रहा था। उसकी गुलाबी चूत पीछे से उभर कर बाहर को निकल आयी थी। उसने अपना लंड उसकी चूत पर रखा और अंदर घुसाने लगा। उसे कोई जल्दी नहीं थी, वो आराम से अपने लंड को थोड़ा-थोड़ा अंदर पेल रहा था। जब उसका पूरा लंड ज़ूबी की चूत में घुस गया तो वो बड़े आराम से अपनी सहकर्मी को चोदने लगा। इस कहानी के लेखक राज अग्रवाल है!

थोड़ी देर उसकी चूत चोदने के बाद उसने अपना लंड बाहर निकाला और उसकी चूत के ऊपर गाँड के छोटे छेद पर घिसने लगा। उसने ज़ूबी के चूतड़ पकड़ कर थोड़ा फ़ैलाये और अपना लंड अंदर घुसाने लगा। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

“नहीं वहाँआँआँ नहींईंईंईं ज़ूबी चींख पड़ी, “प्लीज़ वहाँ नहींईंईं।”

पर जैसे ज़ूबी की चींख का उस पर कोई असर नहीं पड़ा। सीमा ने ज़ूबी की बांहें कस कर पकड़ रखी थी जिससे वो कोई विरोध ना करे। वैसे तो सीमा मन से इस क्रिया का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी पर उसने देखा कि ज़ूबी सिर्फ़ मुँह से ही विरोध कर रही थी शरीर से नहीं।

जैसे ही प्रशाँत ने अपना लंड उसकी गाँड में घुसाया, ज़ूबी ने महसूस किया कि उसके शरीर की गर्मी और बढ़ गयी। उसे लगा कि जैसे कोई गरम लोहा उसकी गाँड मे घुसा दिया हो।

“नहीं प्लीज़ नहीं ज़ूबी ने एक बार फिर विरोध करने की कोशिश की। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

पर प्रशाँत उसकी बात को अनासुना कर अपना लंड उसकी गाँड में घुसाता गया।

“प्लीज़ ज़ूबी फिर बोल पड़ी, “मेरी चूत में डालो, मुझे अपनी चूत में लंड अच्छा लग रहा था।”

ज़ूबी ने जब देखा कि उसकी इल्तज़ा का उस मर्द पर कोई असर नहीं हो रहा है तो उसने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया और अपनी टाँगें और फैला दी। उसने महसूस किया कि अब उस मर्द का लंड आसानी से उसकी गाँड के अंदर बाहर हो रहा है।

प्रशाँत अब उसकी गाँड में धक्के लगा रहा था। ज़ूबी ने सीमा के हाथों को कस कर पकड़ रखा था जिससे वो उसके धक्कों की ताकत से गिर ना जये। जब प्रशाँत के अंडकोश ज़ूबी की चूत से टकराते तो ज़ूबी का शरीर उत्तेजना में और बिदक जाता और खुद-ब-खुद पीछे हो कर उसके लंड को अपनी गाँड में और ले लेती। ज़ूबी के शरीर और मादकता ने फिर एक बार उसे धोखा दे दिया।

प्रशाँत अब कस कर धक्के मार रहा था और ज़ूबी भी आगे पीछे हो कर उसके धक्कों का साथ दे रही थी। ज़ूबी अब अपनी खुद की दुनिया में खो गयी थी और अपने बदन में उठती गर्मी को शाँत करने में लग गयी।

प्रशाँत ने देखा कि ज़ूबी ने अपना एक हाथ नीचे को कर रखा था और उसके धक्कों के साथ-साथ अपनी चूत में अँगुली अंदर बाहर कर रही थी। प्रशाँत ने देखा कि ज़ूबी हर धक्के पर उसका साथ दे रही थी और थोड़ी देर में ही उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया।

जैसे ही ज़ूबी की चूत ने पानी छोड़ा, प्रशाँत ने अपना लंड उसकी गाँड से बाहर निकाल लिया। उसने ज़ूबी को घुमा कर अपने सामने घुटनों के बल कर दिया। ज़ूबी समझ गयी कि अब वो क्या चाहता है।

आँखों पर पट्टी बंधे होने की वजह से ज़ूबी उसके लंड को देख तो नहीं सकती थी। उसने अपनी जीभ बाहर निकाल ली और उसके लंड पर फिराने लगी जो थोड़ी देर पहले उसकी गाँड के अंदर घुसा हुआ था। फिर अपना पूरा मुँह खोल कर उसने लंड को अंदर लिया और चूसने लगी। अब वो जोरों से अपने मुँह को ऊपर नीचे कर के उसके लंड को चूस रही थी। इस कहानी का मूल शीर्षक "दास्तान- वक्त के फैसले" है।

सीमा ने पीछे से ज़ूबी की दोनों चूचियों को पकड़ा और मसलने लगी और वो एक हाथ से उसकी चूत को सहला रही थी।

ज़ूबी जोरों से लंड को चूस रही थी। उसने महसूस किया कि उस मर्द का लंड अकड़ने लगा है, वो समझ गयी कि वो अब झड़ने वाला है। ज़ूबी अब और जोरों से लंड को चूस रही थी। प्रशाँत की हुँकार कमरे में गूँजने लगी और उसने अपना गाढ़ा वीर्य ज़ूबी के मुँह मे छोड़ दिया।

ज़ूबी उस वीर्य को निगलने की कोशिश कर रही थी और प्रशाँत ने उसकी आँखों पर बंधी पट्टी को खोल दिया। पट्टी खुलते ही ज़ूबी ने अपने बॉस प्रशाँत की शक्ल देखी। वो हैरत भारी नज़रों से प्रशाँत को घूर रही थी जिसका लंड उसके मुँह में अंदर बाहर हो रहा था।

दिल्ली से घर लौटते वक्त प्लेन में ज़ूबी बड़ी मुश्किल से अपनी आँख में आते आँसूओं को रोक पा रही थी। वो अपनी ज़िंदगी के बारे मे सोच रही थी जिसने उसे एक वकील से रंडी बना कर रख दिया था। उसने लाख सोने की कोशिश की पर बीते हुए कुछ दिनों की यादें उसे सोने नहीं दे रही थी।

एक बात अब भी उसकी समझ में नहीं आ रही थी कि प्रशाँत वहाँ कैसे पहुँच गया। एक बार तो उसे लगा कि मिस्टर राज ने जान-बूझ कर उसे फँसाया है। पर दिल कहता कि राज ऐसा क्यों करेगा? उसे प्रशाँत से क्या फायदा हो सकता है। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अगर ऑफिस में उसके साथियों को अगर पता चला तो वो क्या सफ़ाई देगी। और उसका शौहर तो तुरंत उसे तलाक दे देगा। इन ही सब ख्यालों में डूबी ज़ूबी ने अपने आप को नसीब के सहारे छोड़ दिया, और आने वाली ज़िंदगी का इंतज़ार करने लगी।

!!!! समाप्त !!!!


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